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《阴律无情》

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विद्युत्-प्रकाश की स्क्रीन वाला नरक क्या है? यह उन लोगों के लिए है जिन्होंने जीवित रहते अश्लील पत्रिकाएँ, अश्लील डिस्क, अश्लील चित्र, अश्लील लघु फ़िल्में, अश्लील ध्वनियाँ और बातें आदि बनाने का अपराध किया था। कुल मिलाकर ये ऐसे अश्लील उत्पाद हैं जो मनुष्यलोक के सत्त्वों के मन में दूषित कल्पनाएँ या सीधे यौन दुराचार के विचार पैदा कर सकते हैं। ऐसे उत्पाद जानबूझकर कंप्यूटर की वेबसाइटों पर डाल दिए जाते हैं, ताकि सत्त्व उन्हें अपनी इच्छा से देखें। इससे मनुष्यलोक के सत्त्वों के विचार दूषित होते हैं और वे यौन दुराचार का पापकर्म करते हैं। अथवा जो लोग सत्त्वों के विचारों को विचलित करने वाले ऐसे अश्लील उत्पाद वेबसाइटों पर दोबारा साझा करना पसंद करते हैं, उन्हें भी आयु पूरी होने पर इस नरक में आकर दंड भोगना पड़ता है।

इस नरक में दंड भोगने आने वाले सभी सत्त्वों को तब तक रहना पड़ता है, जब तक उनके बनाए अश्लील उत्पाद वेबसाइटों से पूरी तरह मिट न जाएँ। इन्हें दोबारा साझा करने वाले सत्त्वों को भी तब तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है, जब तक उनसे प्रभावित सत्त्व बुरे मार्ग को छोड़कर सही मार्ग पर न लौट आएँ और ऐसे अश्लील उत्पाद देखने से उत्पन्न यौन दुराचार फिर कभी न करें। तभी वे इस नरक से बाहर निकल सकते हैं।

मैंने परलोक के न्यायाधिकारी से पूछा: “इस नरक में तो काफ़ी लोग हैं? इन्हें बनाने वाले इतने सारे लोग हैं!”

परलोक के न्यायाधिकारी ने कहा: “इन्हें दोबारा साझा करने वाले सभी सत्त्व भी इसी अपराध के भागी हैं और उन्हें इस नरक में दंड भोगना पड़ता है। बेशक, उनका अपराध इन्हें बनाने वालों से कुछ हल्का होता है। कंप्यूटर की वेबसाइटें थोड़े ही समय में अनगिनत भोले और नासमझ बच्चों के मन में विष भर सकती हैं और उनके मानसिक विकास के मार्ग को गंभीर रूप से बिगाड़ सकती हैं। हर व्यक्ति के बालमन का विकास उसके वयस्क जीवन के आचरण की आधारशिला होता है, लेकिन आज लोगों को इतनी छोटी उम्र में ही ऐसी बुरी लत लग जाती है। जैसा कि ‘क्षितिगर्भ सूत्र’ में कहा गया है: ‘यदि बुरे संयोग मिलें, तो हर विचार के साथ बुराई बढ़ती जाती है।’ आदत स्वभाव बन जाती है। बड़े होने के बाद पश्चात्ताप का भाव जगाकर अपनी भूलें सुधारना बहुत कठिन होता है, जब तक कि किसी महान कल्याणमित्र का उपदेश न मिल जाए। आज संसार में कंप्यूटर तकनीक दिन-प्रतिदिन बदल रही है। कर्मफल की शिक्षा के अभाव में अब अनगिनत नाबालिग बच्चे हर दिन वेबसाइटों पर ऐसे अश्लील उत्पाद देख रहे हैं। इन सभी कारणों और कर्मफलों की ज़िम्मेदारी ऐसे अश्लील उत्पाद बनाने और दोबारा साझा करने वालों को उठानी होगी। इसलिए परलोक ने विशेष रूप से ऐसा नरक बनाया है, ताकि ऐसे सत्त्वों को कठोर दंड दिया जा सके।”

मैंने देखा कि इस नरक के सत्त्व पूरी तरह नग्न होकर एक-एक कंप्यूटर की ओर जा रहे थे। उन्हें कंप्यूटरों में जो कुछ दिखाई दे रहा था, वह सब अश्लील सामग्री थी, लेकिन मुझे कंप्यूटर के रूप वाले यातना-यंत्र दिखाई दे रहे थे। ये कंप्यूटर आग जैसे लाल थे और चमकते प्रतीत होते थे। जब अपराधी आत्माएँ कामासक्त होकर कंप्यूटर के पास जातीं, तो कंप्यूटर आग जैसे लाल काँटे छोड़ता और तुरंत उनकी दोनों आँखें खींचकर निकाल लेता। विद्युत्-युक्त बर्फ़ की सुइयाँ भी उन्हें इस तरह बेधतीं कि उनके पूरे शरीर से रक्त बहने लगता। पहले सिर में चुभतीं, फिर नीचे की ओर बढ़ते हुए पूरे शरीर को बेध देतीं। कुल मिलाकर दृश्य अत्यंत भीषण था! ऐसी क्रूर यातनाएँ भी अनिश्चित काल तक सहनी पड़ती थीं, जब तक कि वे अश्लील उत्पाद संसार से पूरी तरह मिट न जाएँ। यह तो सचमुच असीम और अनंत पीड़ा थी! पहले इस नरक से बाहर चलें! यह दृश्य देखा नहीं जा रहा था!

परलोक के न्यायाधिकारी ने आगे बताया: “आ यू, ‘परलोक के अटल विधान’ के पुस्तक रूप में प्रकाशित होने से पहले तुम्हें इसकी सामग्री वेबसाइट पर सार्वजनिक कर देनी चाहिए, ताकि जिन सत्त्वों का इससे कर्म-संबंध हो, वे एक-दूसरे को बताएँ और इसे दोबारा साझा करें। इस तरह लोगों के चित्त को शुद्ध करने का प्रभाव उत्पन्न हो सकेगा। इसे दोबारा साझा करने वाले सत्त्वों के परलोक में रखे व्यक्तिगत शुभ-अशुभ कर्मों के लेखे में एक महान पुण्यकर्म दर्ज किया जाएगा। यह माता-पिता की श्रद्धापूर्वक सेवा करने के पुण्य के बराबर होगा, कोई अंतर नहीं होगा।

सभी बुराइयों में यौन दुराचार सबसे आगे है, और सभी सदाचरणों में माता-पिता की श्रद्धापूर्वक सेवा सबसे पहले है। मेरे स्वामी, परलोक के अधिपति, मनुष्यलोक के उन लोगों की सबसे अधिक सराहना और प्रशंसा करते हैं जो माता-पिता की श्रद्धापूर्वक सेवा करते हैं। आज यहीं तक। अब तुम लौट जाओ।”

मैंने हाथ जोड़कर परलोक के न्यायाधिकारी से विदा ली! श्वेत कमल पर सवार होकर लौट गई।

15/परलोक की सामान्य बस्ती के जीवन से रहस्य का परदा उठाना

जब से ‘परलोक के अटल विधान’ प्रकाशित होना शुरू हुआ है, कुछ लोगों ने मान लिया है कि ये लेख आत्माओं से लेखनी चलवाकर या किसी आत्मा के आवेश में लिखे गए हैं। इसलिए यहाँ एक बार फिर ज़ोर देकर कहना आवश्यक है कि मैं, आ यू, ध्यान में बैठकर शांत होने के बाद अपने मन को भटकते विचारों से मुक्त करती हूँ, तभी उसकी शक्ति को एकाग्र कर पाती हूँ! इसके बाद बुद्ध की शक्ति के आशीर्वाद के सहारे, पूरी तरह सजग अवस्था में, श्वेत कमल पर सवार होकर एक क्षण में नरक पहुँच जाती हूँ। इसलिए ‘परलोक के अटल विधान’ की सामग्री को बार-बार नरक जाकर सत्यापित किया गया है और संदर्भ के रूप में इसका मूल्य अत्यंत ऊँचा है! यदि कोई भूल हो, तो वह मेरी साधना सीमित होने के कारण गलत सुन लेने से हुई है। लेकिन बुद्धों और बोधिसत्त्वों के लिए कार्य करने तथा सभी सत्त्वों के हित के लिए शील का पालन करने की मेरी भावना बिल्कुल सच्ची है!

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