यौन दुराचार के लिए परलोक के दंड-विधान
गुआन पवित्र सम्राट के यौन दुराचार से विरत रहने के सूत्र की व्याख्या
वेनचांग सम्राट का यौन दुराचार से विरत रहने का बहुमूल्य उपदेश
महागुरु यिनगुआंग द्वारा संशोधित ‘शौकांग बाओज्यान’ में शरीर की रक्षा और जीवन सँभालने के लिए संयम की तिथियों तथा स्वर्ग, पृथ्वी और मनुष्य से संबंधित निषिद्ध दिनों की तालिका
‘परलोक के अटल विधान’ से जुड़ी मेरी कहानी
0/लेखिका की भूमिका
अमिताभ बुद्ध! आप सभी को नमस्कार!
बुद्ध के प्रति कृतज्ञ हूँ कि उन्होंने मुझ विनीत साधिका को 《परलोक के अटल विधान》 लिखने का पावन अवसर प्रदान किया। मैं, आ यू, अत्यंत लज्जित हूँ कि अपने कर्मबल की अनेक बाधाओं के कारण बुद्ध की इच्छा और आकाशीय इच्छा के अनुरूप इस पुस्तक को शीघ्र पूरा नहीं कर पाई। इसके लिए मैं सभी के सामने गहरा पश्चात्ताप करती हूँ। मैं महायान बोधिसत्त्वों की प्राणियों के प्रति बिना किसी शर्त वाली महान मैत्री और सबको अपने ही समान मानने वाली महान करुणा की भावना सीखूँगी और 《परलोक के अटल विधान》 का शेष लेखन पूरा करती रहूँगी।
《परलोक के अटल विधान》 लिखना शुरू करने के बाद से मेरा ज्ञान और अनुभव तो बढ़ा ही है, साथ ही मुझे ऐसी अनेक घटनाओं का सामना भी करना पड़ा है जो इस जीवन में पहले कभी नहीं हुई थीं। उन्होंने सचमुच मेरे मनोबल की कठिन परीक्षा ली है और मेरी मानसिक शक्ति तथा ऊर्जा को बहुत क्षीण किया है। जब मेरी मानसिक शक्ति और ऊर्जा कम होती है, तो मैं नरक नहीं जा पाती। इससे लेख लिखने में देर होती है और इसी कारण 《परलोक के अटल विधान》 अब तक पूरी नहीं हो पाई है।
《परलोक के अटल विधान》 लिखने से मुझे जो सबसे गहरा अनुभव हुआ है, वह शीलों का पालन करने के महत्त्व की गहरी समझ है। बहुत-से लोग सोचते हैं कि शीलों का पालन उनसे बहुत दूर की बात है, वह तो गृहत्यागी साधकों का काम है और हम सामान्य मनुष्यों से उसका कोई संबंध नहीं। यह सोच सचमुच कर्मफल के अनुरूप नहीं है और न ही परलोक के विधान के अनुकूल है। वास्तव में सभी महान सिद्धि प्राप्त करने वालों के लिए आवश्यक है कि जब वे साधना के कारण बोने की अवस्था में सामान्य मनुष्य ही हों, तभी से सिद्धांत और धर्म के अनुसार सभी शीलों की सावधानीपूर्वक रक्षा करें।