“अमिताभ बुद्ध! मैं हाथ जोड़कर न्यायाधिकारी को साष्टांग प्रणाम करती हूँ!”
“न्यायाधिकारी! आज मैंने एक वेबसाइट पर स्वास्थ्यकर भोजन का विषय देखा। इस आहार-विशेषज्ञ के पास भोजन और स्वास्थ्य के विषय में काफी सिद्धांत और अनेक प्रकार के वैज्ञानिक आँकड़े थे; स्वास्थ्यकर आहार का उसे गहरा ज्ञान था। उसने उपमाओं से समझाने वाला एक लेख लिखा कि भोजन को सुखद और स्वास्थ्यकर व्यंजन कैसे बनाया जाए। उसका वर्णन संक्षिप्त, सजीव और बहुत सोच-समझकर किया गया था। लोगों को स्वास्थ्यकर आहार पर ध्यान देना सिखाना तो बहुत अच्छा विषय है, लेकिन उसने पूरी प्रक्रिया की उपमा एक स्वास्थ्यकर संभोग-प्रक्रिया से दी। भाषा खुली और अश्लील थी, जिससे तरह-तरह की भ्रामक कल्पनाएँ उठें और सम्यक स्मृति खो जाए। यह लेख पढ़कर मुझे लेखक के लिए बड़ा खेद हुआ। स्वास्थ्यकर आहार के इतने सिद्धांतों का अध्ययन करने में उसने इतना समय लगाया और फिर वेबसाइट पर ऐसा लेख लिख दिया!”
मैं न्यायाधिकारी से पूछना चाहती हूँ, “मनुष्य यदि ऐसी भाषा इस्तेमाल करके दूसरों में अनुचित विचार और कर्म उत्पन्न करे, तो क्या उसे नरक में दंड भोगना पड़ता है? ऐसा नरक हो तो मैं उसे भी देखना चाहती हूँ।”
न्यायाधिकारी बोले, “मनुष्य यदि अतिरंजित और खोखले शब्दों से दूसरों में अनुचित विचार और कर्म उठाए, ऐसी भाषा बोले जिससे आत्मिक स्वभाव का मलिन होना बढ़े; या मीठी-मीठी असत्य बातें करे और मुस्कान के पीछे छुरी छिपाए; या लोगों को खुश करने के लिए अवास्तविक, देखने में सही पर वास्तव में गलत बातें, निरर्थक तर्क-वितर्क, उपहास जैसी चित्त को बिखेरने वाली निष्फल बातें करे; या दैनिक जीवन में अश्लील चुटकुले सुनाकर मन को भरमाए, कामना भड़काए और लोगों में कामासक्ति उत्पन्न करे; या कामना बढ़ाने वाले गीत, प्रेमकथाएँ, फ़िल्में, टेलीविज़न कार्यक्रम, नृत्य-गीत, संगीत, चित्र आदि रचे जिनकी विषयवस्तु और शब्द अशोभन हों तथा युवाओं में लोभ, द्वेष, मोह, हत्या, चोरी, यौन दुराचार और झूठ बढ़ाएँ, और उनकी सम्यक स्मृति नष्ट करें—ये सभी अशोभन वाणी के अपराध में आते हैं।
अशोभन वाणी का अपराध करने वाले मनुष्य आयु पूरी होने पर काँच-कंप्यूटर नरक में दंड भोगेंगे। काँच-कंप्यूटर नरक झूठ बोलने वाले नरकों के क्षेत्र में स्थित एक नरक है। अशोभन वाणी लोभ, द्वेष, मोह और अहंकार की साथी है; वह अनजाने में लोगों के आत्मिक स्वभाव को दूषित करती है। समय सीमित है, इसलिए अब हम उसे देखने चलें।”
अच्छा! हम तेज़ी से नरक के मध्य भाग को पार कर गए। जब दूर झूठ बोलने वाले नरकों के क्षेत्र के दो बड़े साँप धुँधले दिखे—अरे, वे तो कठोर वाणी के नरक के दो बड़े साँप थे!—हम धीरे-धीरे ज़मीन की ओर उतरने लगे। उतरते समय एक अत्यंत आधुनिक इमारत वाला, चमक लौटाता काँच का नरक साफ़ दिखा। वह बहुत नए चलन का लगता था, लेकिन दृश्य का सारा आनंद बिगाड़ने वाली थी काँच की कान चीरती आवाज़ और पीड़ा की कराहें। सचमुच बहुत शोर था!
इस नरक के प्रवेशद्वार की सजावट देखने में भव्य और सुंदर लगती थी। अक्षरों के रंग और उनके मेल भय पैदा नहीं करते थे। यदि वह कर्कश, पीड़ाभरी आवाज़ और स्वयं नरक की अंधेरी यिन-ऊर्जा न होती, तो द्वार पर खड़े होकर कुछ ऐसा लगता कि हम नरक में हैं ही नहीं। हम यक्षों के साथ भीतर देखने गए।
भीतर पारदर्शी काँच के बहुत-से छोटे-छोटे कमरे थे। हर अपराधी आत्मा अपने काँच के कमरे में यातना भोग रही थी। दंड मिलने की गति कुछ अलग थी: बाईं ओर के कंप्यूटर अधिकतर लाल रंग के थे और वहाँ आत्माएँ अधिक तेज़ी से दंड भोगती थीं; दाईं ओर सभी कंप्यूटर काले थे और गति धीमी थी।
पहले बाईं ओर की आत्माओं को देखें! एक स्त्री आत्मा पारदर्शी काँच के कमरे में अभी-अभी सामान्य, स्वस्थ मानवीय रूप में लौटी और खड़ी हुई थी। अग्नि जैसे लाल स्फटिक-कंप्यूटर से निकलते धुँधले हरे प्रकाश और “टिंग—टिंग—चूँ—चूँ—रिन—रिन” जैसी आवाज़ों ने उसे आकर्षित किया। पास पहुँचते ही स्फटिक-कंप्यूटर की स्क्रीन से नुकीले मुँह और पूरे शरीर पर काँटे वाला छोटा लाल साँप तुरंत उड़कर निकला और उसकी जीभ पकड़कर काटने लगा। आत्मा घबराकर चीखी! जीभ पकड़ने के बाद छोटे लाल साँप ने अपने काँटेदार शरीर से उसे लपेट लिया, जब तक जीभ टूटकर ज़मीन पर नहीं गिर गई। आत्मा का मुँह रक्त से भर गया। तभी पूरा स्फटिक-कंप्यूटर अचानक चकनाचूर हो गया, काँच के फटने और टूटने जैसी आवाज़ हुई, और उसके टूटे हुए सारे हिस्से आत्मा के शरीर से टकराए। आत्मा भयभीत होकर बचने लगी, पर काँच का कमरा इतना छोटा था कि बचने की कोई जगह ही नहीं थी। वह केवल पीड़ा और विवशता में बार-बार यही दंड सह सकती थी। दाईं ओर के काले कंप्यूटरों से मैंने धूसर-काला प्रकाश निकलते देखा; उनमें से काले कनखजूरे उड़कर निकलते थे। बाकी दंड एक जैसा था, बस उसकी गति थोड़ी धीमी थी।
न्यायाधिकारी ने यक्ष से उस स्त्री आत्मा को मेरे सामने लाने को कहा, ताकि मैं उससे पूछ सकूँ। उसने रोते हुए बताया कि जीवित रहते उसे दफ़्तर में और मित्रों के सामने आदतन ऐसे अश्लील चुटकुले सुनाना पसंद था जो ऊपर से सही लगें पर वास्तव में गलत हों; वह जानबूझकर लोगों को अपनी सुंदर काया की प्रशंसा करने के लिए उकसाती थी।