आज परलोक के न्यायाधिकारी मुझे यौन दुराचार के नरकों में से विद्युत्-प्रकाश नेत्र नरक दिखाने ले गए। यह नरक उन जीवों के लिए है जिन्हें जीवनकाल में अश्लील पुस्तकें पढ़ना या अश्लील वेबसाइटें देखना पसंद था। आयु पूरी होने पर वे इस नरक में कर्मफल भोगने आते हैं। यहाँ आने वाले जीवों का दंड उनकी उम्र और कितनी बार उन्होंने ऐसी सामग्री देखी, इसके अनुसार तय होता है। न्यूनतम नरक-दंड 50 वर्ष है। ऐसी सामग्री में डूबने वाले की उम्र जितनी कम होती है, दंड उतना ही कठोर होता है।
अधिकांश लोग अश्लील वेबसाइटें देखने के बाद आगे अन्य यौन दुराचार भी करते हैं, जैसे हस्तमैथुन, अनुचित समय पर, अनुचित स्थान पर या अनुचित अंगों में यौन आचरण, यहाँ तक कि यौन उत्तेजना बढ़ाने वाले उपकरणों का उपयोग भी। ऐसी अश्लील पुस्तकें पढ़ना मनुष्य के अच्छे मूल स्वभाव को गंभीर रूप से नष्ट करता है, विशेषकर उन बच्चों का, जिनकी प्रकृति निर्मल और शरीर शुद्ध यांग का होता है। जब वयस्कों को भी ऐसी सामग्री नहीं देखनी चाहिए, तो अवयस्क बच्चों की बात ही क्या!
आज मनुष्यलोक में बहुत-से किशोर और युवा कंप्यूटर पर ऐसी अश्लील वेबसाइटें देखते हैं। जो भी कामवासना में डूबता है, उसके शरीर, मन और आत्मा—सभी के स्वस्थ विकास पर निश्चित रूप से सीधा प्रभाव पड़ता है। मनुष्य प्रतिदिन अपने विचारों और मनोभावों के सहारे जीवन जीता है। विचार और मनोभाव आचरण को प्रेरित करते हैं; आचरण शुभ और अशुभ कर्म बनाता है; शुभ और अशुभ कर्म भाग्य तय करते हैं; भाग्य कर्मबल उत्पन्न करता है; और कर्मबल उत्पन्न होने पर उसका फल भोगना पड़ता है।
बार-बार अश्लील वेबसाइटें देखने से मनुष्य के विचार सुस्त और धुँधले हो जाते हैं तथा कामकाज में स्पष्टता नहीं रहती। विशेषकर बच्चों पर इसका प्रभाव बहुत व्यापक होता है और यह मानव जन्म में साधना का अच्छा अवसर नष्ट कर देता है। कहावत है, ‘कामवासना के चीनी अक्षर के सिर पर एक छुरी है।’ प्राचीन काल से आज तक, देश-विदेश में कितने ही प्रसिद्ध लोग, सेनापति और सैनिक कामवासना की इस परीक्षा को पार नहीं कर पाए।
परलोक के न्यायाधिकारी ने कहा, “पहले तो अश्लील पुस्तकें या अश्लील वेबसाइटें देखने पर हर बार आशीषों और आयु का क्षय होता है; इसके बाद आगे बढ़कर अन्य यौन दुराचार करने पर भी इसी तरह आशीषें और आयु घटती हैं। यह धीमी आत्महत्या के समान है।
आज मनुष्यलोक में विज्ञान और तकनीक विकसित हैं। छोटे बच्चे भी कंप्यूटर इस्तेमाल करते हैं और बहुत-से बच्चे अश्लील वेबसाइटें देखते हैं। कुछ माता-पिता को इसका पता नहीं होता, क्योंकि वे स्वयं कंप्यूटर चलाना नहीं जानते। वे बच्चों को अपने आप कंप्यूटर सीखने देते हैं और कभी पूछताछ नहीं करते। प्रतिदिन काम में भी इतने व्यस्त रहते हैं कि बच्चों के मामलों पर ध्यान देने के लिए उनके पास अतिरिक्त समय ही नहीं होता। या जो कुछ अधिक संपन्न हैं, वे बच्चे की देखभाल के लिए घरेलू कर्मचारी रख लेते हैं, पर वह भी आवश्यक नहीं कि ठीक से देखभाल करे। इसलिए इन माता-पिता की आशीषें भी घटती हैं। यह कहकर कि उन्हें पता नहीं था, वे इसकी उपेक्षा नहीं कर सकते। ‘पालना, पर शिक्षा न देना, पिता का दोष है।’ माता-पिता को स्वयं ध्यान देकर बच्चों को शिक्षित करना और उनके स्वस्थ विकास का मार्गदर्शन करना चाहिए। कुछ माता-पिता जानते हुए भी बच्चों को रोकते नहीं हैं, या इसे यौन शिक्षा मानकर उन्हें देखने की छूट देते हैं। कुछ तो यह भी कहते हैं कि समय बदल गया है, अब खुलापन है और विद्यालयों में छोटे बच्चों के लिए भी यौन शिक्षा अनिवार्य पाठ्यक्रम है। यह बहुत गंभीर रूप से गलत समझ है। परलोक का प्रशासन आशा करता है कि आ यू, आप इस बार नरक का भ्रमण करने के बाद मनुष्यलोक में लौटकर चेतन जीवों को कुमार्ग छोड़कर सन्मार्ग अपनाने की चेतावनी देंगी। वे मनुष्यलोक के कुछ दशकों के समय को सँजोएँ, समाज के आचरण और लोगों के मन को लाभ पहुँचाने वाले अधिक कार्य करें, और दूसरों तथा स्वयं को हानि पहुँचाने वाले काम न करें। अन्यथा, अगली साँस न आते ही मृत्यु के बाद वे मुझसे मिलने आ जाएँगे!”
अब दर्दनाक चीखें सुनाई देने लगी थीं। वे विद्युत्-प्रकाश नेत्र नरक में कठोर यातना भोगते जीवों की थीं। इस नरक में विशेष यंत्रों से युक्त बहुत-से बड़े कंप्यूटर लगे थे, प्रत्येक आत्मा के लिए एक कंप्यूटर। कंप्यूटरों में देखने के लिए सामग्री थी और हर आत्मा अपना कंप्यूटर देख रही थी। न देखती तो ठीक था, लेकिन देखते ही वह ज़ोर से चीख उठती थी।
एक पुरुष आत्मा बहुत युवा थी, देखने में बीस से अधिक और तीस से कम उम्र की लगती थी। उसके कंप्यूटर से काँटों के आकार की लाल विद्युत्-प्रभा निकलती थी, जो सीधे उसकी दोनों आँखों में फँसकर नेत्रगोलकों को चीरते हुए बाहर खींच लेती थी। ज़मीन पर हर ओर ताज़ा रक्त था और वह पुरुष आत्मा अपार पीड़ा तथा दुःख में दिखाई दे रही थी! यह वेबसाइटों पर अश्लील फ़िल्में, चित्र और उपन्यास आदि देखने का कर्मफल था।
परलोक के न्यायाधिकारी ने कहा कि इस पुरुष आत्मा ने बचपन से ही अश्लील वेबसाइटें देखना शुरू कर दिया था और वह हस्तमैथुन भी करता था। बहुत बार ये अपराध करने के कारण उसके पूरे जीवन की आशीषें बहुत जल्दी समाप्त हो गईं और वह नरक में गिर पड़ा। उसके माता-पिता अभी भी मनुष्यलोक में अपने प्रिय पुत्र को खो देने पर विलाप कर रहे थे।
पास में एक अपराधी आत्मा मेज़ पर बैठकर अश्लील पुस्तक पढ़ रही थी। उसे भी अभी देखे गए आँखों को काँटों से खींचने वाले कर्मफल जैसा ही, उतना ही कठोर दंड मिल रहा था, लेकिन दंड दिए जाने की गति कुछ धीमी थी। मैंने परलोक के न्यायाधिकारी से पूछा कि दंड की गति अलग क्यों है। उन्होंने कहा, “क्योंकि कंप्यूटर पर अश्लील वेबसाइटें देखने वाले सामान्यतः थोड़े समय में अधिक सामग्री देख लेते हैं और कुल मिलाकर उस पर समय भी अपेक्षाकृत अधिक बिताते हैं। लेकिन अश्लील पुस्तकें, चित्र-पत्रिकाएँ और उपन्यास पढ़ने वालों के पास केवल कुछ सीमित पुस्तकें ही होती हैं। यदि किसी जीव ने जीवनकाल में ऐसी सामग्री अधिक न देखी हो और बाद में उसे बोध हो जाए, वह पश्चात्ताप करके फिर अपराध न करे, और इसके उलट भलाई की प्रेरणा देने वाले इस लेख का भरपूर प्रचार करे, जीवों को अश्लील वेबसाइटें, डिस्क और पुस्तकें फिर न देखने के लिए समझाए, तथा अपने धन से यथाशक्ति अश्लील पुस्तकें और डिस्क आदि खरीदकर जला दे और इस तरह अच्छे कर्मों से अपने दोषों की भरपाई करे, तो वह इस नरक का कर्मफल भोगने से बच सकता है।”