आज मैं विदा लेती हूँ। श्वेत कमल पर सवार होकर लौटती हूँ!
22/गर्भपात करने वाले डॉक्टरों का इस जन्म और अगले जन्म का कर्मफल—विखंडन नरक में 100000 वर्ष का दंडात्मक कारावास
जिस शहर में मैं रहती हूँ, वहाँ के समाचारपत्रों में अक्सर ऐसी खबरें छपती हैं कि कुछ किशोरियाँ गर्भपात के बाद घर में बेहोश हो गईं और उन्हें एम्बुलेंस से उपचार के लिए अस्पताल ले जाना पड़ा; या उन्होंने अभी-अभी जन्मे शिशु को मारकर फेंक दिया। कुछ तो उसे मारे बिना ही सीधे बीसवीं या तीसवीं मंज़िल से बाहर फेंक देती हैं। यह सचमुच घोर अनुचित है। इसका कारण आज के समाज का दूषित वातावरण है। हर ओर खराब विचारों वाले विज्ञापन हैं। घड़ी बेचने के विज्ञापन में भी गहरे गले के कपड़े पहने लड़की दिखाई जाती है और उसमें कहा जाता है कि संबंध सदा बना रहे, इसकी परवाह नहीं, बस कभी उसे पा लिया था, यही मायने रखता है। अंतर्वस्त्रों, वज़न घटाने आदि के दूसरे विज्ञापन तो और भी देखने योग्य नहीं हैं। स्त्री-पुरुष के प्रेम और भोग के ऐसे तरह-तरह के चित्र तथा वीडियो विज्ञापन बहुत अधिक हैं जो लोगों की चेतना को सुन्न कर देते हैं। इसके साथ ही मीडिया लगातार लोकप्रिय सितारों के व्यभिचारपूर्ण निजी जीवन, अनियंत्रित यौन आचरण और विवाहेतर संबंधों की खबरें प्रसारित करता रहता है। इससे नैतिक धारणाएँ गिरती हैं और आज के किशोर-किशोरियाँ भटककर यह मानने लगते हैं कि यही समय के सबसे आगे चलना है। परिणामस्वरूप, यौन विषयों का पर्याप्त ज्ञान न होने पर भी किशोर-किशोरियों का यौन व्यवहार निर्भीक और उन्मुक्त हो गया है। वास्तव में यह आध्यात्मिक पतन है।
मीडिया की इन्हीं नकारात्मक खबरों का प्रभाव गर्भपात की स्थिति को दिन-ब-दिन और गंभीर बना रहा है तथा अनेक सामाजिक समस्याएँ भी उत्पन्न कर रहा है। केवल लोगों को इसका पता नहीं है, इसलिए इसे गंभीरता से नहीं लिया गया। जानकारी के अनुसार, जापान में कम-से-कम दो हज़ार मंदिर ऐसे हैं जो विशेष रूप से शिशु आत्माओं को भेंट चढ़ाने के लिए हैं। इससे जापान में गर्भपात की चौंकाने वाली संख्या का पता चलता है। ताइवान में भी 1997 में वार्षिक गर्भपातों की अनुमानित संख्या तीन लाख थी, 1999 में चार लाख और 2000 में पाँच लाख थी। ये आँकड़े केवल नमूनों के आधार पर निकाले गए अनुमान हैं; सटीक वास्तविक आँकड़े सार्वजनिक नहीं किए जाते।
अमेरिका के मिनेसोटा राज्य में किए गए एक अध्ययन से पता चलता है कि गर्भपात के बाद छह महीनों के भीतर किशोरियों की आत्महत्या की दर गर्भपात न करवाने वाली किशोरियों की दर से दस गुनी है। अन्य संबंधित अध्ययन भी बताते हैं कि कई बार गर्भपात करवा चुकी किशोरियों में गर्भपात के छह महीनों के भीतर आत्महत्या और मानसिक अव्यवस्था का जोखिम और अधिक बढ़ जाता है।21
आइए, फिर देखें कि बौद्ध सूत्र प्राणिहत्या के कर्मफल के बारे में क्या कहते हैं। इस विषय पर सचमुच बहुत-से ग्रंथ हैं। पहले 《उपासक-शील सूत्र》 में कही गई यह बात देखें: “सभी जीव प्राणिहत्या के कारण वर्तमान जीवन में कुरूपता, दुर्बलता, बदनामी और अल्पायु पाते हैं; उनकी संपत्ति घटती है, स्वजनों से बिछोह होता है, सज्जन और आर्य उनकी निंदा करते हैं तथा लोग उन पर विश्वास नहीं करते। अपराध दूसरे करते हैं, लेकिन अनायास उसकी विपत्ति उन पर आ पड़ती है। इसे वर्तमान जीवन में दुष्कर्म का फल कहते हैं। इस शरीर को छोड़ने के बाद उन्हें नरक में गिरना होगा, अनेक कष्ट और संताप सहने होंगे, भूख-प्यास के साथ लंबा जीवन भोगना होगा तथा कुरूपता, दुर्बलता और बदनामी जैसी स्थितियाँ सहनी होंगी। इसे अगले जीवन में दुष्कर्म का फल कहते हैं। यदि उन्हें मानव शरीर मिल भी जाए, तो फिर कुरूपता, अल्पायु और दरिद्रता भोगनी होगी। ऐसे एक दुष्ट व्यक्ति के कर्मजनित कारणों और परिस्थितियों की शक्ति से बाहरी संसार के सभी प्रकार के अनाज, वृक्षों के फल और लताओं के फल घट जाते हैं। उस व्यक्ति से उत्पन्न विपत्ति फैलकर एक पूरे जगत को प्रभावित करती है।”
अब देखें कि बुद्ध 《ब्रह्मजाल सूत्र》 में क्या कहते हैं: “सभी पुरुष मेरे पिता हैं। सभी स्त्रियाँ मेरी माता हैं। जन्म-जन्मांतर में ऐसा कोई जन्म नहीं जिसमें मैंने उनसे जन्म न लिया हो।” बुद्ध ने कहा: “बुद्धपुत्रों! स्वयं प्राणिहत्या करना, दूसरों से प्राणिहत्या करवाना, उपाय करके प्राणिहत्या करना, प्राणिहत्या की प्रशंसा करना, किसी को ऐसा करते देखकर प्रसन्न होना, यहाँ तक कि मंत्रों से प्राणिहत्या करना—प्राणिहत्या के हेतु, उसकी परिस्थितियाँ, उसकी विधियाँ और उसका कर्म—इन सबके संबंध में, किसी भी प्राणधारी जीव को जानबूझकर नहीं मारना चाहिए। बोधिसत्त्व को सदा करुणा और माता-पिता के प्रति आदर-सेवा का भाव उत्पन्न करना चाहिए तथा सभी जीवों को बचाने और उनकी रक्षा करने के उपाय करने चाहिए। इसके विपरीत, यदि वह मन को उच्छृंखल छोड़कर अपने सुख के लिए प्राणिहत्या करता है, तो यह बोधिसत्त्व का पाराजिक अपराध है।” बुद्ध अनेक सूत्रों में प्राणिहत्या के कारण नरक में मिलने वाले कर्मफल का विस्तार से वर्णन कर चुके हैं।22
अब नरक जाकर परलोक के न्यायाधिकारी से पूछती हूँ कि दूसरों का गर्भपात करने वाले चिकित्सकों को क्या कर्मफल मिलता है?
बुद्ध की शक्ति से आशीर्वाद और संरक्षण की प्रार्थना करती हूँ! श्वेत कमल पर सवार होकर प्रस्थान करती हूँ!
अमिताभ बुद्ध! मैं, आ यू, परलोक के न्यायाधिकारी को हाथ जोड़कर प्रणाम करती हूँ!