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《阴律无情》

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अमिताभ बुद्ध! मैं, आ यू, परलोक के न्यायाधिकारी को साष्टांग प्रणाम करती हूँ!

आज मैं परलोक के न्यायाधिकारी से पूछना चाहती हूँ: “गर्भपात के परिहार के क्या उपाय हैं, और आप लोग इस परिहार के विषय को कैसे देखते हैं?”

परलोक के न्यायाधिकारी ने कहा: “जीवितों के लोक में माता-पिता के मामले में गर्भपात किसी भी कारण से हुआ हो, यदि गर्भपात संपन्न हो गया, तो प्राणिहत्या का कर्म पूरा हो चुका है। नरक की जीवन-मृत्यु की बही में यह दर्ज हो जाता है कि किस वर्ष और किस महीने एक अजन्मे शिशु की आत्मा की हत्या की गई। आयु समाप्त होने पर उन्हें नरक में परलोक के महान सभागार में मुकदमे और दंड के लिए जाना होगा। यदि गर्भपात इसलिए हुआ कि शिशु-आत्मा के पास मनुष्य लोक में जन्म लेने के लिए पर्याप्त पुण्यफल नहीं था, तो ऐसे माता-पिता को नरक में जाकर दंड नहीं भोगना पड़ता। फिर भी उन्हें अपने कर्म और पुण्यफल की कमी के लिए पश्चात्ताप करना चाहिए, जिसके कारण वे उस शिशु को सफलतापूर्वक मनुष्य लोक में नहीं ला सके। उन्हें पश्चात्ताप करके पुण्य समर्पित करना चाहिए और कामना करनी चाहिए कि शिशु-आत्मा शीघ्र ऊपर उठकर किसी सुगति में जन्म ले सके। हर बात कारण और फल के संबंधों से जुड़ी है। शिशु-आत्मा गर्भ में प्रवेश कर पाती है क्योंकि उसके और भावी माता-पिता के बीच पिछले जन्मों के शुभ-अशुभ कर्मों से जुड़े असंख्य कारण-फल संबंध होते हैं। बीच में ही उसकी मृत्यु हो जाना परलोक के विधान के अंतर्गत ऐसा निश्चित कर्म है जिसे बदला नहीं जा सकता। इसका कारण यह है कि शिशु-आत्मा और भावी माता-पिता, दोनों ने पिछले जन्मों में प्राणिहत्या, चोरी और यौन दुराचार के कर्म किए थे।

गर्भपात शिशु-आत्मा के लिए पीड़ादायक होता है। अधिकांश मामलों में शिशु-आत्मा ने जितनी पीड़ा सही है, भविष्य में भावी माता-पिता को भी उतनी ही पीड़ा एक बार सहनी पड़ती है। इसके अलावा, दो ऐसे कारण हैं जिनसे दंड भोगने की अवधि दुगुनी हो जाती है। पहला, यदि समय का अंतर लंबा हो, तो अवधि दुगुनी करनी पड़ती है। समय का अंतर गर्भपात के समय से गिना जाता है। यदि भावी माता-पिता लगातार पश्चात्ताप न करें, ऐसा मानें जैसे कुछ हुआ ही न हो और कारण-फल तथा कर्मफल के चक्र पर विश्वास न करें, जबकि शिशु-आत्मा अकेली नरक के ‘अन्यायपूर्ण मृत्यु के रुदन-नगर’ में पीड़ा से आँसू बहाती, कष्ट सहती और द्वेष रखती रहे, तो शिशु-आत्मा का कष्ट लगातार खिंचता जाता है और उसका द्वेष भी अधिक गहरा होता जाता है। कुछ मामलों में मनुष्य लोक के भावी माता-पिता का पुण्यफल अधिक होता है, इसलिए उन्हें तत्काल कर्मफल नहीं भोगना पड़ता। उन्हें उनके पुण्यफल के समाप्त होने के बाद ही फल मिलता है। कुछ को तो अगले जन्म तक प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है। ऐसे मामलों में समय कुछ अधिक लंबा हो जाता है। लेकिन परलोक के विधान में कारण और फल समय, युग या रूप-रंग बदलने से कभी अस्त-व्यस्त नहीं होते। ऐसा नहीं कि फल मिलेगा ही नहीं; बस उसका समय अभी नहीं आया है। कारण-फल के नियम में तनिक भी चूक नहीं होती। इस पूरी अवधि में बने कर्म-संबंधों का फल गर्भपात करवाने वाले माता-पिता को लौटकर मिलेगा। इसलिए गर्भपात करवा चुके सभी भावी माता-पिता को जल्द से जल्द सच्चे मन से पश्चात्ताप करना चाहिए और इस समस्या का सामना करके इसका समाधान करना चाहिए। अन्यथा शिशु-आत्मा के ऋण वसूलने के कर्मफल का सामना अवश्य करना पड़ेगा और परलोक के अटल विधान के कठोर फल से बचना भी कठिन होगा।

दूसरा कारण यह है कि यदि शिशु-आत्मा की अपनी बात से चिपके रहने की प्रवृत्ति विशेष रूप से प्रबल हो, तो दंड की अवधि दुगुनी करनी पड़ती है। गर्भपात के बाद जीवितों के लोक में माता-पिता में विशेषकर माँ का अपराध कुछ अधिक भारी होता है, क्योंकि गर्भपात का अंतिम निर्णय माँ ही करती है। जीवितों के लोक में बहुत-सी माताएँ अंतिम क्षण में गर्भपात न करवाने का निर्णय लेती हैं। ऐसी माताएँ जीवन बचाने का पुण्य संचित कर सकती हैं। जिन शिशु-आत्माओं की हठपूर्वक चिपके रहने की प्रवृत्ति प्रबल होती है, वे प्रायः ऋण वसूलने के लिए जन्म लेने वाले बच्चे होते हैं। दुर्भाग्य से उन्हें फिर गर्भपात का भाग्य झेलना पड़ता है, जिससे यह अशुभ कर्म-संबंध बहुत गहरा हो जाता है। अर्थात, गर्भ में आने के समय ही उनका द्वेष बहुत गहरा था; उस पर गर्भपात की पीड़ा और द्वेष जुड़ जाने से यह अशुभ संबंध अत्यंत गहरा हो जाता है। इसलिए उसका फल भोगते समय दंड दुगुना हो जाता है।

गर्भपात के परिहार के दो उपाय हैं। एक आंतरिक शक्ति पर निर्भर करता है, अर्थात मन से किए गए सच्चे पश्चात्ताप की शक्ति से इसे सुलझाना। दूसरा बाहरी शक्ति पर निर्भर करता है: पुण्य संचित करना और भलाई करना, जिससे इस घटना को लेकर शिशु-आत्मा का द्वेष धीरे-धीरे कम हो। केवल इन्हीं दो उपायों से परिहार संभव है। प्रत्येक मामले में कितना समय लगेगा, इस पर एक ही नियम नहीं लगाया जा सकता। निश्चय ही, जितने अधिक गर्भपात करवाए गए हों, उतना ही अधिक समय लगेगा, क्योंकि प्रत्येक गर्भपात से एक शिशु-आत्मा के साथ अशुभ कर्म-संबंध बनता है। यह अशुभ संबंध कितना गहरा है, यह भावी माता-पिता और उस शिशु-आत्मा के पिछले जन्मों के कर्मों पर निर्भर करता है। यदि संबंध शुभ था, तो स्थिति कुछ बेहतर होती है। वह उपकार का प्रतिदान करने आई थी, इसलिए स्वाभाविक रूप से आगे की परेशानियाँ कम होंगी। लेकिन गर्भपात शिशु-आत्मा को पीड़ा देता है, इसलिए पहले का शुभ संबंध अशुभ संबंध में बदल जाता है। यदि वह अशुभ संबंध के कारण आई थी, तो गर्भपात से स्थिति और बिगड़ती है तथा द्वेष और गहरा हो जाता है। हर गर्भपात शिशु-आत्मा को बहुत अधिक पीड़ा देता है। पीड़ा की मात्रा प्रत्येक मामले में अलग होती है। सामान्यतः वह भ्रूण के आकार के साथ धीरे-धीरे बढ़ती है: भ्रूण जितना बड़ा होता है, पीड़ा उतनी अधिक और द्वेष भी उतना ही प्रबल होता है।24

गर्भपात के कर्मफल की उत्पत्ति के कई पहलू हैं। वर्तमान में गर्भपात से मारी गई अधिकांश शिशु-आत्माओं की यह स्थिति लोगों के यौन दुराचार के कारण होती है। यही गंभीर समस्या है। गर्भपात के कर्म से जुड़े लोगों में भावी माता-पिता, चिकित्सक और दूसरों को गर्भपात करवाने के लिए उकसाने वाले वे लोग शामिल हैं जिनके उकसाने पर गर्भपात हो गया हो। इन सभी को नरक का कर्मफल भोगना पड़ता है। यदि एक शिशु-आत्मा का गर्भपात किया गया है, तो देखना होता है कि उसका द्वेष और उसकी चिपके रहने की प्रवृत्ति कितनी प्रबल है। लेकिन वे गहरे हों या हल्के, अशुभ संबंध बन चुका है। जिसने घंटी बाँधी है, उसे खोलना भी उसी का काम है।25 गर्भपात किसी भी कारण से हुआ हो, जीवितों के लोक के भावी माता-पिता को गहरी लज्जा और पश्चात्ताप का भाव उत्पन्न करना ही चाहिए। गर्भपात के बाद उन्हें प्रतिदिन अत्यंत सच्चे मन से शिशु-आत्माओं से क्षमा माँगनी चाहिए, ताकि इससे उनका द्वेष कम हो। शिशु-आत्माएँ आत्माएँ हैं और उनमें दूसरों के मन को जानने की क्षमता होती है। वे जीवितों के लोक में अपने माता-पिता के विचार जान सकती हैं, इसलिए सच्चे मन से करना आवश्यक है। यदि यह केवल औपचारिकता निभाने के लिए यंत्रवत किया गया हो, सच्चा पश्चात्ताप न हो, तो इसका कोई लाभ नहीं। इसे अत्यंत सच्चे मन से, पर्याप्त निष्ठा और व्याकुल विनय के साथ प्रतिदिन करना चाहिए। आरंभ में बहुत-सी असुविधाजनक अनुभूतियाँ हो सकती हैं। सबसे सामान्य हैं सिरदर्द, छाती में दर्द, हाथ-पैरों में दर्द, कमर और पीठ में दर्द तथा मानसिक तनाव आदि। इन सबकी गिनती नहीं की जा सकती और ये व्यक्ति-व्यक्ति में अलग होती हैं। जीवितों के लोक के थोड़े-से भावी माता-पिता को शरीर में कुछ विशेष पीड़ाएँ सहनी पड़ती हैं। यह शिशु-आत्मा के साथ उनके कर्म-संबंध पर निर्भर करता है। ऊपर बताई गई पीड़ा की अनुभूति सामान्यतः प्रत्येक भावी माता-पिता को होती है। कुछ भावी माता-पिता को ऊपर बताई गई सभी पीड़ाएँ होती हैं। कुछ का गर्भपात-संबंधी कर्मभार उतना भारी नहीं होता: उन्होंने जानबूझकर गर्भपात नहीं किया, बल्कि भ्रूण के पास मनुष्य लोक में जन्म लेने के लिए पर्याप्त पुण्यफल नहीं था, इसलिए गर्भपात हुआ। ऐसे माता-पिता की स्थिति अपेक्षाकृत कुछ बेहतर होती है। फिर भी उन्हें पश्चात्ताप करना चाहिए, ताकि शिशु-आत्मा शीघ्र ऊपर उठ सके। नरक की शिशु-आत्माएँ गर्भपात होने के बाद से ही ‘अन्यायपूर्ण मृत्यु के रुदन-नगर’ में रहती हैं। वे दुःख और क्रोध के साथ प्रतीक्षा करती हैं कि यमराज शीघ्र निर्णय देकर परलोक के पीले आदेश-पत्रक जारी करने की अनुमति दें। ये आदेश-पत्रक जारी होते ही वे बदला लेने मनुष्य लोक में आ सकती हैं। उस समय मनुष्य लोक में भावी माता-पिता का भाग्य हर ओर से अवश्य गिरने लगता है। नौकरी, व्यवसाय, स्वास्थ्य और लोगों से संबंध आदि, सभी में तरह-तरह की बाधाएँ आने लगती हैं। मनुष्य लोक में प्रतिदिन बहुत-से भावी माता-पिता गर्भपात करवाते हैं, और इसी से जीवितों के लोक में अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। उदाहरण के लिए, बार-बार इलाज के बाद भी ठीक न होने वाला आधासीसी का दर्द, विभिन्न जटिल स्त्रीरोग, यौन रोग तथा मनोविकृति (साइकोसिस) आदि, ये सब गर्भपात के कारण उत्पन्न होते हैं। ऐसे रोगों का समाधान सच्चे पश्चात्ताप की शक्ति और भलाई करके पुण्य संचित करने से ही हो सकता है। अन्यथा केवल धन, समय और मनुष्य लोक की दवाएँ व्यर्थ जाती हैं। संभव है कि पूरे जीवन में भी समाधान न हो और अधूरा कर्मफल अगले जन्म तक खिंचकर वहाँ जारी रहे। इसका परिहार मन के विचारों के स्तर पर करना आवश्यक है। मनुष्य के मन में उठने वाले विचार अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। उसका एक विचार भी समय और स्थान को पार करके शुभ या अशुभ घटनाओं को घटित करने के लिए पर्याप्त है। याद रखो, गर्भपात के बाद स्वयं पश्चात्ताप करना चाहिए; पैसे देकर किसी दूसरे को अपनी ओर से पश्चात्ताप और सूत्र-पाठ करने का काम सौंपना नहीं चाहिए। जीवितों के लोक में शिशु-आत्माओं की पूजा और अर्पण के बहुत-से स्थान हैं। वास्तव में, उनमें से अधिकांश प्रभावहीन हैं और केवल धन व्यर्थ होता है।26

गर्भपात करवाने वाले भावी माता-पिता को एक ओर प्रतिदिन अत्यंत सच्चे मन से शिशु-आत्माओं के सामने पश्चात्ताप करके क्षमा माँगनी चाहिए, और दूसरी ओर स्वयं 《क्षितिगर्भ सूत्र》 या अन्य बौद्ध सूत्रों का पाठ करना चाहिए। जिनकी क्षमता अनुमति देती हो, उन्हें अधिकाधिक जीवों को मुक्त करके उसका पुण्य शिशु-आत्माओं को समर्पित करना चाहिए। गर्भपात प्राणिहत्या का कार्य है; इससे दुष्कर्म संचित होते हैं और पीड़ा आती है। गर्भपात के बाद प्रत्येक भावी माँ के मन में एक अनाम अपराधबोध अवश्य उत्पन्न होता है। यह अपराधबोध गर्भपात के कर्मफल के कारण होता है। इसे दूर करने के लिए मन से किए गए पश्चात्ताप की शक्ति द्वारा शिशु-आत्मा की क्षमा प्राप्त करनी चाहिए। कुछ भावी माताएँ शायद कहें कि उन्हें ऐसा अनुभव नहीं होता। वास्तव में ऐसा नहीं कि वह है ही नहीं; उनकी जमी हुई आदतें और क्लेश इतने भारी हैं, अर्थात उनके कर्मावरण इतने भारी हैं, कि उन्होंने इस अनुभूति को ढक दिया है। जीवों को मुक्त करना जीवन बचाना है और इससे मंगल फल आता है। जब जीव मुक्त किए जाते हैं, तो वे प्रसन्न और कृतज्ञ होते हैं तथा उनसे शुभ संबंध भी बनते हैं। जीवों को मुक्त करके उसका पुण्य शिशु-आत्माओं को समर्पित करना चाहिए, ताकि वे शीघ्र दुःख से छूटकर सुख प्राप्त करें और ऊपर उठकर शुद्धभूमि पहुँचें।

परलोक भी गर्भपात के परिहार के उपायों को महत्त्व देता है। वर्तमान में जीवितों का लोक यौन दुराचार से भ्रमित और अस्त-व्यस्त युग में पहुँच चुका है। यौन दुराचार के परिणामस्वरूप होने वाला गर्भपात युवाओं के लिए रोज़मर्रा की बात बन गया है। यौन दुराचार की दूषित ऊर्जा और गर्भपात से उपजे द्वेष की ऊर्जा मनुष्य लोक में भर गई है। ये प्रकृति के संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित करती हैं और अवश्य ही प्राकृतिक तथा मानवजनित विपत्तियों को बुलाएँगी।

परलोक के अधिपति यमराज ने आदेश दिया है कि जीवितों के लोक के जो भी प्राणी सच्चे मन से पश्चात्ताप करके गर्भपात के मामले का समाधान करें, स्वयं आगे सदा के लिए गर्भपात त्यागने का संकल्प लें और साथ ही यह संदेश एक-दूसरे तक पहुँचाकर दूसरों को गर्भपात से रोकें, वे पुण्यकर्म से अपने अपराध का प्रायश्चित्त कर सकते हैं। परलोक में उनकी व्यक्तिगत जीवन-मृत्यु की बही में एक बड़ा पुण्यकर्म दर्ज किया जाएगा। परिस्थिति के अनुसार गर्भपात के कारण मिलने वाला नरक का कर्मफल और दंड घटाया या माफ़ भी किया जा सकता है। अंतिम निर्णय प्रत्येक मामले की विशिष्ट परिस्थितियों को देखकर होगा।”

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