दोषी आत्मा के दुष्कर्म-दर्पण के मंच के सामने खड़े होते ही उसके जीवन के सभी छोटे-बड़े गुप्त दुष्कर्म एक-एक करके दिखाए जाने लगते हैं। जब दुष्कर्म-दर्पण का मंच उन्हें दिखाता है, तो उसके आसपास खड़े सभी जीव उस दोषी आत्मा के सारे पाप और दुष्कर्म एक साथ देख सकते हैं। बहुत-सी दोषी आत्माएँ लज्जा, पश्चात्ताप और भय अनुभव करती हैं, लेकिन तब पछतावे का कोई उपाय नहीं बचता। वे केवल विवश होकर भयानक भूत-प्रहरियों द्वारा घसीटकर ले जाई जाती हैं, ताकि नरक के लंबे और पीड़ादायक दंड आगे भोगें।
यदि कोई मनुष्य जीवन भर सत्कर्म और पुण्य का संचय करे, निष्कपट और उज्ज्वल रहे, उसके मन में तनिक भी छिपाव न हो और उसके शरीर में परम शुभ, शुद्ध यांग ऊर्जा हो, तो दुष्कर्म-दर्पण के मंच के सामने आने पर दर्पण बिल्कुल खाली रहता है। जीवन भर सत्कर्म करने वालों को दुष्कर्म-दर्पण के मंच पर दिखाने के लिए आने की आवश्यकता ही नहीं होती। आयु पूरी होने पर उनकी आत्मिक चेतना की प्रकाशमयता के स्तर के अनुसार वे सीधे उच्चतर लोकों में उठ जाते हैं। जिसकी आत्मिक चेतना जितनी अधिक प्रकाशमय होती है, वह उतना ही ऊपर उठता है। कुछ अन्य दिशाओं के उन बुद्ध-क्षेत्रों में चले जाते हैं जिनसे उनका कर्मसंबंध है; कुछ को पुण्य और सद्गुण से संपन्न शुभ देवता ले जाकर देवलोक में जन्म दिलाते हैं। जो आत्मिक सत्ताएँ न भली हैं, न बुरी, उन्हें दस सभागृहों में न्यायिक सुनवाई के बाद मनुष्यलोक में जन्म लेने के लिए भेजा जाता है। उनके पुण्यफल की मात्रा के अनुसार वे पुरुष या स्त्री, धनी और प्रतिष्ठित या गरीब, दीर्घायु या अल्पायु आदि के रूप में जन्म लेते हैं। दुष्कर्म करने वालों को दुष्कर्म-दर्पण के मंच के सामने आना पड़ता है। उनके जीवन भर के सभी दुष्कर्म आँखों के सामने आ जाते हैं, और फिर भूत-प्रहरी उन्हें लज्जित तथा विवश अवस्था में ले जाते हैं।”
“आ यू, मेरे साथ परलोक के कर्म-दर्पण के महान सभागृह को देखने चलो।”
“जैसी आज्ञा, परलोक के न्यायाधिकारी!”
अब सामने बहुत-से लोग दिखाई दे रहे हैं। वहाँ एक बहुत चौड़ा, अंडाकार बड़ा दर्पण है। परलोक के न्यायाधिकारी ने कहा कि यही दुष्कर्म-दर्पण का मंच है। दर्पण के सबसे ऊपर लिखा है, ‘दुष्कर्म-दर्पण के मंच के सामने कोई भला व्यक्ति नहीं।’ परलोक के न्यायाधिकारी ने मुझे उसका माप लेने को कहा।
उस दुष्कर्म-दर्पण के मंच की ऊँचाई लगभग 3.3 मीटर और चौड़ाई 1.8 मीटर है। देखने में लगता है कि नीले-हरे रंग का एक आयताकार लकड़ी का आधार, जिस पर उभरी हुई नक्काशी है, दुष्कर्म-दर्पण को थामे हुए है। दर्पण का सामने वाला भाग काँच-मणि का है। काँच-मणि के किनारे नीले-हरे रंग की उभरी हुई लकड़ी की नक्काशी से घिरे हैं, और यही काँच-मणि वह बड़ा परदा है जिस पर दोषी आत्मा के जीवन भर के दुष्कर्म दिखाए जाते हैं। दुष्कर्म-दर्पण के मंच की नीली-हरी उभरी हुई लकड़ी की नक्काशी से झिलमिलाती रहस्यमय मंद रोशनी निकलती है। साथ में खड़े क्रूर और विकराल भूत-प्रहरियों को देखकर बहुत भय लगता है! ऊपर से दुष्कर्म-दर्पण के मंच पर कुछ दोषी आत्माओं के वे गुप्त दुष्कर्म दिखाए जा रहे हैं जिन्हें उनके जीवनकाल में कोई नहीं जानता था। अब अपराधी और उसके अपराध का प्रमाण दोनों सामने हैं। यह देखकर सचमुच दिल दहल जाता है, और भय और भी बढ़ जाता है!
यहाँ की दोषी आत्माओं की आयु अभी-अभी पूरी हुई है। वे सभी परलोक का वातावरण महसूस कर पा रही हैं; अधिकांश के चेहरे उदासी और चिंता से भरे हैं। अभी एक पुरुष को कहते सुना: ‘मैंने जीवन भर कभी हत्या या आगज़नी नहीं की। मुझे यहाँ घसीटकर क्यों लाए हो? मुझे बाहर जाने दो!’ देखा कि दो क्रूर भूत-प्रहरी एक पुरुष को खींचते हुए लाए और दुष्कर्म-दर्पण के मंच के सामने ज़ोर से धकेल दिया। उसे अत्यंत पीड़ा के साथ घुटनों के बल बैठने को मजबूर किया गया। चौड़े दुष्कर्म-दर्पण में तुरंत उस पुरुष के जीवन के यौन दुराचार के दृश्य उभर आए। इसमें एक से अधिक स्त्रियाँ थीं; दृश्य बिल्कुल देखने योग्य नहीं थे। इसे अत्यंत घोर यौन दुराचार कहा जाता है। उसने अपनी विधिवत् विवाहिता पत्नी को इतना दुःख और क्रोध दिया कि वह बीमार पड़कर बिस्तर पर पड़ गई और घुट-घुटकर मर गई। अच्छा हुआ कि ये चीज़ें मुझे प्रभावित नहीं कर सकतीं, नहीं तो देखने के बाद आँखें धोनी पड़तीं! इस समय उस दोषी आत्मा के दोनों पैर काँपने लगे थे और भूत-प्रहरी उसे घसीटकर ले गए।
फिर अगली दोषी स्त्री-आत्मा को देखा। वह स्त्री देखने में शालीन थी और उसके नैन-नक्श भी सुघड़ थे। पता नहीं उसने क्या अपराध किया था? दुष्कर्म-दर्पण में दिखा कि उसने अपने मित्र के साथ मिलकर एक ऐसे पुरुष उपासक पर झूठे आरोप लगाए थे जो शील का कठोर पालन करता और धर्म का प्रचार करता था। यह दोषी स्त्री स्वयं बौद्ध धर्म सीखती थी और बौद्ध शिक्षाओं का उसका ज्ञान भी बहुत व्यापक था। दुर्भाग्य से, ईर्ष्या के कारण उसने जानबूझकर उस शीलनिष्ठ धर्मप्रचारक पुरुष उपासक को बदनाम किया और उस पर आरोप लगाया कि उसने अमुक व्यक्ति का बलात्कार किया था। उसके झूठे आरोप सफल हुए और कोई भी उस उपासक से धर्म सुनने नहीं आया। इसलिए उस पुरुष उपासक को एकांत में रहकर साधना करनी पड़ी।
इस दोषी स्त्री-आत्मा ने उस पुरुष उपासक को अपने मित्र से भी अधिक बदनाम किया था। उसके मित्र को बौद्ध धर्म का उतना ज्ञान नहीं था जितना उसे था; उस मित्र में प्रज्ञा की कमी थी और दूसरों की बातें दोहराने की प्रवृत्ति थी; उसने केवल दूसरों के पीछे चलकर बदनामी की। लेकिन इस दोषी आत्मा ने सोची-समझी योजना से उस पुरुष उपासक को बदनाम करने के लिए हर उपाय अपनाया और अंततः उसे एकांत में रहकर साधना करने पर विवश कर दिया।
उस दोषी स्त्री-आत्मा को भी इस बदनामी के कारण गले का कैंसर हुआ82 और साथ में जटिलताएँ भी हुईं। उसके मुँह और नाक से लंबे समय तक मवाद बहता रहा। वह अस्पताल में पड़ी रही, नस में ड्रिप लगी रही, और अंततः पीड़ा में उसकी आयु पूरी हुई। अब उस दोषी स्त्री-आत्मा को पता चल गया था कि बड़ी विपत्ति सिर पर आ गई है। वह तुरंत घुटनों के बल गिरकर क्षमा माँगने लगी। भूत-प्रहरी ने क्रूरता से उसके मुँह में काँटा भोंकते हुए कहा: “देखूँ, अब आगे तुम सद्धर्म को बदनाम करने और लोगों के प्रज्ञा-जीवन को काटने83 का साहस करती हो या नहीं! अब चलो, यमराज के सामने!”