इस समय परलोक के दक्षिण में लिंगशिंग नरकों का एक क्षेत्र है। उस क्षेत्र में ‘पाँच अनाजों की भरपूर फ़सल’ नाम का एक बड़ा नरक है। पाँच अनाजों की भरपूर फ़सल नरक में अधिकांश लोग युवा हैं। वहाँ बरबाद किए गए हर प्रकार के भोजन का ढेर लगा है, इतना अधिक कि वह अंतहीन पर्वत-शृंखलाओं जैसा है। पहले भोजन बरबाद करने वालों को आयु पूरी होने पर परलोक के विधान के अनुसार भूख का दंड मिलता था। अब भोजन बरबाद करने वाले प्राणी आयु पूरी होने पर पाँच अनाजों की भरपूर फ़सल नरक का फल भोगेंगे। जीवित संसार में बरबाद किए गए हर प्रकार के भोजन का पूरा लेखा जन्मसहचर देवता रखता है। आयु पूरी होने पर इस नरक में आकर उन्हें अपने जीवनकाल में बरबाद किया गया सारा भोजन एक-एक करके खाकर समाप्त करना पड़ता है। जीवित संसार में बहुत-से युवा लगातार बहुत सारा भोजन खरीदना पसंद करते हैं और जो खा नहीं पाते, उसे फेंक देते हैं। परलोक का विधान दोषी आत्माओं को ऐसा दंड अनुभव कराता है, जिससे वे समझें कि जो खा नहीं सकते, उसे खरीदकर बरबाद नहीं करना चाहिए। जब आपने उसे खरीद लिया, तो वह आपके पुण्यफल का हिस्सा है और उसे पूरा खाना आवश्यक है। आ यू, मेरे साथ आइए। अब मैं आपको वहाँ घुमाने ले चलता हूँ।”
अभी से खटास, भोजन की सड़ांध और उलटी की गंध आ रही है। उलटी और खाँसी की आवाज़ें भी सुनाई दे रही हैं। अब ‘पाँच अनाजों की भरपूर फ़सल नरक’ के बड़े-बड़े अक्षर दिखाई दे रहे हैं। यह नरक भी बेहद विशाल है! भीतर सचमुच पाँचों अनाजों की भरपूर फ़सल है। भोजन इतना अधिक है कि एक नज़र में उसका छोर दिखाई ही नहीं देता। वह पर्वतों और घाटियों जैसा फैला हुआ है, बहुत भयावह! चावल, व्यंजन, बिस्कुट आदि की गिनती नहीं है। बड़े-छोटे पैकेटों में तरह-तरह का इतना अधिक भोजन है कि सबका एक-एक करके वर्णन नहीं किया जा सकता। पानी और दूसरे पेय भी हैं, जो बड़े-बड़े पात्रों में भरे हैं।
न्यायाधिकारी ने कहा कि हर दोषी आत्मा का भोजन रखने का अपना अलग क्षेत्र है। हर निजी भोजन-क्षेत्र में उसी आत्मा का जीवनकाल में बरबाद किया गया भोजन है; इसमें तनिक भी गलती नहीं होती। मैंने पाँच अनाजों की भरपूर फ़सल नरक में बहुत-से युवा देखे। न्यायाधिकारी ने कहा कि इस नरक का दंड पाने के अलावा उन्होंने यौन दुराचार जैसे दूसरे अपराध भी किए हैं।
अब उधर जाकर एक युवती की आत्मा से पूछती हूँ! उसके उस विशाल क्षेत्र में रखा भोजन देखकर ही बहुत डर लगता है। न जाने किस वर्ष, किस महीने तक वह इसे खाकर समाप्त कर पाएगी। युवती की आत्मा का चेहरा अब भी कुछ सुंदर और सुघड़ लगता है। वह बड़ी पीड़ा से उलटियाँ कर रही है!
“अमिताभ बुद्ध! आपको कैसा महसूस हो रहा है? क्या आप बता सकती हैं कि यहाँ क्यों आई हैं?”
युवती की आत्मा ने कहा, “बहुत, बहुत कष्ट हो रहा है! हर एक क्षण बेहद पीड़ादायक लगता है! उल्टियाँ करते-करते अब मुझसे और सहा नहीं जा रहा! आप कौन हैं? आपसे विनती है, क्या आप मुझे यहाँ से बचाकर बाहर निकाल सकती हैं?”
“क्या आप मुझे बता सकती हैं कि यहाँ क्यों आई हैं?”
“बताती हूँ! बताती हूँ! जीवित रहते मुझे बहुत सारा भोजन खरीदना पसंद था, खासकर तरह-तरह के स्वादिष्ट पकवान। लेकिन मैं खुद बहुत अधिक नहीं खाती थी, क्योंकि डरती थी कि मोटापे से मेरी काया और रूप बिगड़ जाएँगे। फिर भी मैं रोज़ अपनी पसंद का भोजन खरीदकर घर लाती थी। मेरी आदत थी कि मैं पुराना भोजन कभी नहीं खाती थी, केवल ताज़ा भोजन ही खाती थी। कोई नया उत्पाद दिखाई देता, तो उसे ज़रूर खरीदती थी, और जो खा नहीं पाती, उसे फेंक देती थी। दिन पर दिन यह जमा होता गया और अब नरक में आकर मुझे दंडस्वरूप यह सब खाकर समाप्त करना पड़ रहा है। सचमुच बहुत बुरा हाल है! यहाँ बहुत सारा पानी भी है, जिसे मैंने दाँत साफ़ करते और मुँह धोते समय नल लगातार खुला रखकर बरबाद किया था!” युवती की आत्मा फूट-फूटकर रोने लगी! सचमुच इस खट्टे, बदबूदार, फफूँद लगे और बड़े-बड़े कीड़ों से भरे भोजन को देखकर खाने की सारी इच्छा समाप्त हो गई।
अब पास वाली इस अधिक उम्र की स्त्री की आत्मा को देखती हूँ। उसका भोजन-क्षेत्र पिछली युवती की आत्मा के क्षेत्र से कई गुना बड़ा है और कहीं अधिक भयावह है! उसका भोजन-क्षेत्र बड़ा ही नहीं है, उसमें भोजन भी बहुत अधिक है और उससे बेहद खट्टी, घिनौनी सड़ांध आ रही है। सब कुछ खराब हो चुका है, उस पर बहुत फफूँद लगी है, रंग बदल गया है और वह कीड़ों तथा रोगाणुओं से भरा है। भला इसे खाया कैसे जा सकता है! देखकर ही मन काँप उठता है!
“अमिताभ बुद्ध! क्या आप मुझे बता सकती हैं कि यहाँ कैसे आईं?”