| धूम्रपान का अभिलेख | पान-ग्वान कहते हैं कि प्रत्येक सिगरेट काले कर्म के साथ-जन्मे देव द्वारा दर्ज होती है। अकेले धूम्रपान में एक पैकेट पूरा होने पर सौभाग्य-क्षति एक बार दर्ज होती है; दो या अधिक पैकेट पर बाधा बढ़ती है। पास दूसरों की उपस्थिति अधिक क्षति की शर्त है। लंबे अभ्यास से आयु और जन्मजात प्रकाश की क्षति भी कही गई है। | S1 L1092–1094 |
| पुरानी आदत छोड़ना और शुभ कारण बनाना | उसी उत्तर में धूम्रपान छोड़ना, पश्चात्ताप सहित पुण्य-संचय और दूसरों को छोड़ने के लिए प्रेरित करना, सौभाग्य तथा आयु की क्षति की पूर्ति के उपाय हैं। सुधार स्वयं का हानिकारक काम रोकने से दूसरों की सहायता तक जाता है। | S1 L1079 |
| उपभोग के पूरे संबंध | भुगतान संपत्ति के लेन-देन का एक पक्ष बताता है; अकेला होना उपस्थित लोगों की स्थिति बताता है। अन्न की कद्र प्रकृति, किसान, माता-पिता और पूर्व सत्कर्म से जुड़ती है; मछली पकड़ने का प्रश्न उसके जीवन और पीड़ा से, और धूम्रपान स्वयं तथा दूसरों पर प्रभाव से जुड़ता है। ये पूरे संबंध प्रत्येक अनुच्छेद का नैतिक अर्थ खोलते हैं। | S1 L1033–1044, L1078–1093; मछली पकड़ने का संवाद: दृश्य-सूची SC26 |
अध्याय 2
जीवन की निरंतरता और उसकी अलग दिशाएँ
एक जीवन से आगे चलता हुआ संबंध
मानवीय जीवन पूरा होने के बाद पुस्तक सभी प्राणियों को एक ही स्थान पर पहुँचते हुए नहीं दिखाती। कहीं प्रकाशमय देवलोक है, कहीं अधोलोक की साधारण बस्ती में खुली दुकानें हैं और कहीं कठोर दंडस्थल हैं। इन अलग दशाओं का संबंध उस जीवन से है जो व्यक्ति पहले जी चुका है और उन चुनावों से भी है जो उसके सामने आगे आते हैं। जन्म पर शरीर, परिवार और अवसर बदलते हैं; देह की आयु समाप्त होने पर फिर जीवन की स्थिति बदलती है। पुराने कर्म अपने फल की ओर चलते रहते हैं, और नए काम आगे के लिए परिस्थितियाँ बनाते हैं। इसी प्रवाह के भीतर मनुष्य, देव, प्रेत और अन्य गतियों का वर्णन आता है। ऊपर उठने और नीचे जाने की भाषा इसी से समझ में आती है: हानिकारक आदत बढ़े तो दुख के कारण बल पाते हैं; समझ, पश्चात्ताप और शुभ आचरण विकसित हों तो जीवन का मार्ग बदल सकता है। अलग लोकों का परिचय इन भिन्न जीवन-दशाओं को निकट से समझने का अवसर देता है।
लोकों और क्षेत्रों के नाम
दिन में दिखाई देने वाला आकाश और देवों का निवास देवलोक, दोनों के नाम कभी एक-दूसरे के पास आते हैं, पर उनके वर्णन अलग बात बताते हैं। आकाश ऊपर दिखने वाला विस्तार है; देवलोक में स्वर्गीय प्राणियों का जीवन और तियान-दी का दरबार है। मनुष्यों का जीवन जिस ओर है, उसे चीनी में ‘यांग-ज्यान’ (阳间) कहा जाता है; मृतकों की ओर के लिए ‘यिन-ज्यान’ (阴间) आता है। अधोलोक की पूरी व्यवस्था ‘दी-फू’ (地府) है। उसमें अभिलेखों की जाँच करने वाले कार्यालय, अधिकारियों के निवास, साधारण बस्तियाँ और दंडस्थल हैं। नरक उस बड़े क्षेत्र में दंड भोगने का स्थान है, इसलिए दुकानों और आपसी लेन-देन वाली बस्ती भी उसी अधोलोक के वर्णन में आ सकती है। ‘ले-युआन’ (乐园) आनंदपूर्ण निवास का व्यापक नाम है, जिसका विशेष अर्थ संबंधित परंपरा और प्रसंग से मिलता है। बुद्ध की शुद्ध भूमि का परिचय फिर वहाँ के बुद्ध और वहाँ जन्म लेने की साधना से खुलता है। इन नामों के साथ उनका काम जान लेने पर जीवन की जगह और साधना के लक्ष्य को अलग-अलग समझना सरल होता है।
किसी प्राणी के बारे में यह पूछना कि वह किस रूप में जीता है, और यह पूछना कि उसका जीवन इच्छाओं या ध्यान से किस तरह जुड़ा है, दो अलग प्रश्न हैं। बौद्ध विश्व-वर्णन की छह गतियाँ पहले प्रश्न का उत्तर देती हैं: देव, मनुष्य, असुर, पशु, भूखे प्रेत और नरकवासी। इनमें अंतिम तीन को दुर्गतियाँ कहा जाता है। काम, रूप और अरूप के तीन लोक दूसरे संबंध को खोलते हैं। कामलोक में इंद्रिय-विषयों की इच्छा और सुख आते हैं; रूपलोक में सूक्ष्म शरीर तथा ध्यान की अवस्थाएँ हैं; अरूपलोक में रूपधारी शरीर का अभाव और अरूप ध्यान से जुड़ा जीवन है। इन लोकों में कर्म के अनुसार चलता अस्तित्व ही काम-भव, रूप-भव और अरूप-भव, अर्थात् ‘तीन भव’ (三有), कहलाता है। इसके अतिरिक्त स्थान का परिचय भी है। दक्षिण जम्बूद्वीप बौद्ध विश्व-वर्णन का भूभाग है और ‘चेन-दान’ (震旦) चीन का पुराना नाम। इसीलिए कोई एक साथ मनुष्य, कामलोक का निवासी और दक्षिण जम्बूद्वीप के चीन से आया हुआ कहा जा सकता है। पुस्तक की प्रस्तावना में ऊपर, मध्य और नीचे के क्षेत्रों द्वारा मिलकर लेखन में सहायता देने की बात है; वहाँ पास के वाक्य में आकाश, धरती, देव और प्रेत उस काम से आशा रखते हैं। वहाँ का प्रयोग सहयोग का विस्तार बताता है।