किसी की मानवीय आयु पूरी होने वाली हो तो उसे लेने वाले कर्मचारी घटना से पहले ही निर्धारित स्थान पर पहुँचते हैं। उनके पास समय और पहचान जाँचने के लिए एक विशेष सूचना-पत्र होता है। यह काम बताने वाले दो पात्र ‘निउ-तोउ’ (牛头, बैल-मुख) और ‘मा-म्येन’ (马面, अश्व-मुख) हैं। पशु-मुख उनके रूप को बताता है; पद की दृष्टि से वे अधोलोक के अग्रिम पंक्ति के कर्मचारी हैं, जो जीवों को लेते और आगे पहुँचाते हैं। निउ-तोउ स्वयं अपने दैनिक काम की चर्चा करते हुए बताते हैं कि उन्हें बहुत-सी मृत्यु-सूचनाएँ मिलती हैं। इस पत्र का पूरा नाम ‘मिंग-फू लिंग-ती तोंग-द्ये’ (冥府灵体通牒) है, जिसे छोटा करके मिंग-द्ये भी कहते हैं। नाम और स्थान के साथ वर्ष, महीना, दिन, घंटा, मिनट और सेकंड तक दर्ज रहता है। जीवन किस घटना से समाप्त होगा, वह भी उसमें मिलता है। कर्मचारी इन्हीं विवरणों से पहले पहुँचकर पहचान और परिस्थिति देखते हैं। भारतीय भाषाओं में परिचित यमदूत का काम इसे समझने में सहायक है; यहाँ सूचना-पत्र और उसकी इतनी सूक्ष्म समय-गणना चीनी पुस्तक का अपना विवरण है।
सूचना-पत्र का रंग यह भी बताता है कि किस प्रकार के कर्म प्रधान हैं और उसे कौन ला रहा है। हल्का पीला पत्र शुभ कर्मों की प्रधानता वाले व्यक्ति से जुड़ा है। उसे ‘शांग-शान सी’ (赏善司, सत्कर्म-पुरस्कार विभाग) और ‘फ़ा-ए सी’ (罚恶司, दुष्कर्म-दंड विभाग), दोनों के कर्मचारी लाते हैं। इस विवरण में ये दोनों विभाग एक साथ हल्के पीले पत्र के अंतर्गत आते हैं। गहरे लाल पत्र के वाहक निउ-तोउ और मा-म्येन हैं; उनका पत्र भारी दुष्कर्म तथा नरक में उसका फल भोगने की दशा बताता है। इसीलिए रंग समझते समय विभाग का काम और पत्र के साथ बताई गई कर्म-स्थिति भी साथ पढ़ी जाती है। एक ही मृत्यु-सूचना का प्रयोजन हर बार जीवन की पूरी हुई अवधि और उसके आगे के प्रस्थान की जानकारी देना है। आगे की अवस्था का अंतर उस व्यक्ति के अपने कर्मों से जुड़ा है; पत्र में दर्ज पहचान, समय और घटना उसी विशेष व्यक्ति की सूचना पूरी करते हैं।
इतनी सूक्ष्म सूचना मिलने पर भी लेने आने वालों को पहचान जाँचनी होती है। निउ-तोउ उसके दो आधार बताते हैं। पत्र में मृत्यु की घटना पहले ही दिखाई देती है, इसलिए कर्मचारी आने वाले क्रम को देख लेते हैं। दूसरा आधार व्यक्ति की अपनी दीप्ति है: सत्कर्म से वह उज्ज्वल रहती है, और भारी दुष्कर्म की दशा में बुझी हुई दीप्ति को काला नरकीय प्रकाश घेर लेता है। इन संकेतों से काम करते हुए कर्मचारी परिस्थिति भी देखते हैं। फिर उनके उत्तर में एक संभावित चूक का प्रश्न आता है। यदि कभी गलत व्यक्ति ले आया जाए, तो उसे तुरंत मनुष्य-लोक भेज दिया जाएगा और मिंग-जुन उस गलती का कारण विस्तार से जाँचेंगे। अनजाने में हुई भूल करने वाले को सुधार का अवसर मिलता है; साथ ही अपनी लापरवाही का फल कर्मचारी को भी भोगना होता है। इसलिए यह व्यवस्था केवल पत्र पर लिखे नाम को बुलाने तक सीमित नहीं रहती। पहले पहुँचने, घटना को देखने और संबंधित व्यक्ति की पहचान सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी उसी काम में शामिल है।
पत्र किसी घटना की सूचना देता है; उसके पीछे पिछले जीवन और आचरण का लेखा भी होता है। जीवन की अवधि और परिस्थितियों से जुड़ी बही ‘शंग-सी बू’ (生死簿) है; शुभ-अशुभ कर्मों की बही में विचार तथा कार्य दर्ज होते हैं। अनुमति देने वाली पट्टिका अलग काम करती है—उससे किसी निश्चित कार्य की स्वीकृति मिलती है। सुनवाई के समय कर्म सामने लाने का एक और साधन ‘न्ये-जिंग ताइ’ (孽镜台), कर्म-दर्पण का मंच, है। आ-यू उसकी ऊँचाई लगभग 3.3 मीटर और चौड़ाई 1.8 मीटर बताती हैं। हरे-नीले रंग का नक्काशीदार लकड़ी का आधार और घेरा उसे थामे हुए है; सामने का हिस्सा पर्दे की तरह घटनाएँ दिखाता है। जीवन में जो कार्य दूसरों से छिपे रहे, वे वहाँ दिखाई देते हैं और उनकी जाँच होती है। इस तरह लिखित बही, कार्यवाही की सूचना और दृश्य में सामने आया कर्म सुनवाई में अलग-अलग काम करते हैं। उनके पीछे जिस बात की खोज है, वह संबंधित व्यक्ति की अपनी भावना और उससे हुआ आचरण है।
दैनिक जीवन के भले-बुरे काम अभिलेख तक कैसे पहुँचते हैं, इसका भी पुस्तक में अपना विवरण है। जन्म से जीवन के अंत तक मनुष्य के साथ रहने वाले दो देव ‘जु-शंग शन’ (俱生神) कहलाते हैं। बाईं ओर पुरुष रूप वाला देव रहता है, जिसकी आभा हल्की सफ़ेद है; वह शुभ विचार और शुभ कार्य लिखता है। दाईं ओर हल्की काली आभा वाली देवी रहती है और अशुभ विचारों तथा कार्यों का लेखा रखती है। दोनों हर महीने अपना विवरण अधोलोक को देते हैं। पुस्तक बताती है कि बहुत अधिक बुरे कर्म देखकर देवी रोष के साथ सावधान भी करती है, यद्यपि उसके हल्के संकेत को बहुत कम लोग ग्रहण कर पाते हैं। यहाँ मन के भीतर उठी बात और बाहर किया हुआ काम, दोनों लेखे का विषय हैं। पहले बताए स्थानीय रक्षक क्षेत्र की देखभाल करते और अधोलोक से जन्म-मृत्यु अथवा स्थान छोड़ने की सूचना पाते हैं। इन दो देवों का मासिक विवरण दूसरी जिम्मेदारी पूरी करता है: व्यक्ति के दैनिक विचार और कर्म आगे अभिलेखों तक पहुँचते हैं।
बही में किसी अगले जीवन की आयु और अनुभव पहले से लिखे मिलें, तो उनके साथ उन पुराने कर्मों का विवरण भी आता है जिनसे ये परिस्थितियाँ बनीं। संपत्ति, साधन और कठिनाइयों को पुस्तक इसी संबंध में समझाती है। आगे मनुष्य क्या करता है, उसका प्रभाव फिर भी जारी रहता है। बड़े सत्कर्म, गंभीर दुष्कर्म और बार-बार अपनाई जाने वाली आदतें बाद की दिशा बदलते हैं। साधारण साधक की करुणा, गुप्त भलाई और शील बढ़ने से आगे के शुभ कारण बढ़ते हैं; भारी दुष्कर्म उसे नीचे ले जाते हैं। इस बीच पहले के कर्मों का बचा हुआ फल भी उसी जीवन में मिल सकता है। इसलिए कोई व्यक्ति सुधार की ओर बढ़ते हुए बीमारी या अन्य कठिनाई से गुज़र सकता है। बुद्ध और बोधिसत्त्व का कठिन दशा में आना संकल्पपूर्वक जीवों की सहायता करने से जुड़ा है; वे वहाँ भी शिक्षा देते हैं। साधक के लिए उपयोगी प्रश्न है कि सामने आए फल के बीच वह अब कैसा आचरण करे। पुराने कारण अपने अवसर पर फलते हैं, और आज का सच्चा प्रयत्न आने वाले जीवन के कारण तैयार करता है।
कुछ पुराने कर्मों का फल बनने की तैयारी इतनी दृढ़ हो चुकी होती है कि सामान्य दशा में वह फल आना तय है। पुस्तक इन्हें ‘दिंग-ये’ (定业, स्थिर हो चुका कर्म) कहती है। युए फ़ेई युद्ध के बारे में बोलते हुए सामूहिक कर्म की ऐसी ही दृढ़ता समझाते हैं। उस उत्तर में हानि घटने के लिए बुद्ध की सहायता के साथ अत्यंत प्रबल शुभ कर्म का मिलना आवश्यक बताया गया है। वहाँ परिवर्तन का आशय पहले से बने विनाश को न्यूनतम कर देना है। इससे प्रयत्न का आकार भी समझ में आता है: जब दुष्फल के कारण बहुत दृढ़ हों, तो उन्हें सँभालने के लिए शुभ कारणों को भी उतना प्रबल होना पड़ता है। अन्य जीवन-प्रसंगों में आयु, साधन और जन्म की परिस्थितियों के साथ बाद की आदतों का उल्लेख इसी कारण बना रहता है। कोई शेष दुख भोगते हुए संयम, करुणा और सदाचार बढ़ा सकता है; विपरीत चुनाव फिर अधोगति के कारण जोड़ते हैं। सहायता से मिले अवसर और स्वयं किए काम साथ मिलकर आगे का मार्ग बनाते हैं।
किसी कार्य को करने की अनुमति दस्तावेज़ से भी पहचानी जाती है। लेखिका को लिखने की अवधि में अधोलोक आने-जाने की अनुमति मिली थी। छंग-ह्वांग के द्वार-रक्षक उनके आने का संदेश पहले पा चुके थे; शरीर पर टँगी पट्टिका देखकर वे पहचान की पुष्टि करते हैं। इस अनुमति में व्यक्ति, अवधि और लेखन का प्रयोजन स्पष्ट है। एक दूसरे प्रसंग में शिशु-जीव पीला कागज़ लेकर आते हैं। वह मिंग-जुन यान-वांग की स्वीकृति है, जिसके आधार पर दूत उन्हें वांग-सी खू-छंग से निकलकर अपने माता-पिता को खोजने देते हैं। यहाँ आदेश देने वाला, उसे लागू करने वाले और बाहर जाने वाले अलग-अलग दिखाई देते हैं। कागज़ का रंग तथा उसका पदार्थ भी बताया गया है। लेखक की आने-जाने की पट्टिका और शिशुओं की यह स्वीकृति, दोनों किसी निश्चित काम की अनुमति देते हैं। पहले परिचित मृत्यु-सूचना में भी रंग था, पर उसका विषय समय और घटना की जानकारी था। दस्तावेज़ किस काम के लिए दिया गया है, उससे उसके रंग और रूप का अर्थ पूरा होता है।
दस्तावेज़ों की भाषा और सदाचार का शिक्षण
लेखिका को दी गई अनुमति का आरंभ अधोलोक की एक आपात बैठक से होता है। पान-ग्वान बताते हैं कि दंडस्थलों में भीड़ बढ़ रही थी, निर्माण चलता रहता था और कर्मचारी कम पड़ते थे। मिंग-जुन ने बारह न्यायालयों के अधिपतियों तथा अन्य अधिकारियों को बैठक का संदेश भेजा। इसके बाद लोगों को समय रहते अपने आचरण का फल बताने के लिए तियान-दी से निवेदन किया गया। उन्होंने बुद्ध से शीलवान साधक चुनने का अनुरोध किया। उसका काम जाग्रत अवस्था में परिस्थितियाँ जानना और मनुष्य-लोक के लिए उनका वृत्तांत लिखना था। आ-यू को यह दायित्व मिला; पान-ग्वान उनके सहायक बने और दूसरे अधिकारियों को प्रतिनिधि घटनाएँ उपलब्ध कराने को कहा गया, ताकि पुस्तक जल्दी लोगों तक पहुँच सके। निर्माण पर विचार करने वाली बैठकें भी वृत्तांत में आती हैं। विस्तार के एक विवरण में 1995 ईस्वी के बाद काम तेज़ होने और दक्षिण में आठ बड़े नरकों का नया समूह बनने का उल्लेख है। लिखने की व्यवस्था इन बढ़ते कामों के बीच की गई: मनुष्य रहते समझ आए और आचरण बदले, तो आगे इतने कष्ट के कारण ही कम बनें।