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《阴律无情》文化导读 · HI

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章节目录

पहली भेंट में लेखिका स्वर्गीय महल के द्वार पर एक नाम पढ़ती हैं और भीतर उसी अधिपति को दूसरे संबोधन से पुकारती हैं। द्वार पर ‘दी-शी तियान’ (帝释天) है; संवाद में ‘तियान-दी’ (天帝), अर्थात स्वर्ग के अधिपति। इस प्रसंग में दोनों नाम एक ही व्यक्ति के लिए आए हैं। दी-शी तियान बौद्ध शक्र का चीनी नाम है, जिसकी पुरानी नाम-परंपरा इन्द्र से भी जुड़ती है। यहाँ अधिपति का काम एक निवेदन सुनना और उसके लिए व्यवस्था करना है: अधोलोक से लोगों के आचरण पर चिंता प्रकट की गई है, और वे बुद्ध से किसी शीलवान साधक को चुनने का अनुरोध करते हैं, जो कर्मफल का वृत्तांत लोगों तक पहुँचा सके। पुस्तक के साथ संलग्न एक पुराने सदाचार-पाठ में अनुमति देने वाले अधिपति का नाम ‘यू-दी’ (玉帝) आता है। यह ‘यू-ह्वांग’ (玉皇), जेड सम्राट, का छोटा संबोधन है। उस अलग पाठ में देवताओं का निवेदन और जिन-के तथा लुन-के को मनुष्य-लोक में पहुँचाने की स्वीकृति उन्हीं से जुड़ी है। इन नामों का परिचय इस प्रकार अपने-अपने संवाद, निवेदन और अनुमति के साथ मिलता है; यहाँ स्वर्गीय शासन और लोककल्याण का दायित्व सामने आता है।

पद और दायित्व

अधोलोक में निर्णय का काम कई स्तरों पर बँटा है। सबसे ऊपर ‘फेंगदू दादी मिंग-जुन यान-वांग’ (丰都大帝冥君阎王) हैं। उनके अधीन बारह न्यायालयों के अधिपति काम करते हैं और प्रत्येक के अंतर्गत छोटे-बड़े दंडस्थल हैं। न्यायालय सुनवाई की संस्था है, उसका अधिपति उस संस्था का अधिकारी, और दंडस्थल वह क्षेत्र जहाँ संबंधित निर्णय लागू होता है। पान-ग्वान बताते हैं कि पहले दस न्यायालय थे; काम बढ़ने पर दो और बनाए गए। इनमें ‘छिंग-पिंग वांग’ (清平王) पश्चिम तथा उत्तर के यौन दुराचार संबंधी क्षेत्रों को सँभालते हैं। ‘हाइ-शान वांग’ (海山王) के अधीन दक्षिण के आठ नए क्षेत्र हैं। पुस्तक वहाँ के कुछ नाम भी देती है: वांग-सी खू-छंग, अन्न की बरबादी से जुड़ा वू-गू फेंग-शोउ, मिथ्या दृष्टि और निंदा का क्षेत्र, तथा वज्रयान नाम वाला क्षेत्र। दक्षिण के आठ क्षेत्रों में से इस उत्तर में इन चार के नाम आते हैं। पुराने चीनी चित्रों में मिलने वाले दस न्यायाधिपतियों का परिचय और यहाँ बताया गया बाद का विस्तार, अपने-अपने विवरण के अनुसार समझ में आते हैं।

सबसे ऊँचा पद पाने वाले अधिपति के जीवन में भी एक पुराने संकल्प का फल बना रहता है। छंग-ह्वांग उनके पिछले जन्म की बात बताते हैं। तब वे न्यायप्रिय सेनापति थे; शत्रु की चाल से युद्ध हारने पर उन्होंने अपराधियों को कठोर दंड देकर सुधारने की प्रतिज्ञा की। अपने सैनिकों की पराजय का दुख, अपनी असावधानी पर क्रोध और बदला लेने की इच्छा भी उस प्रतिज्ञा में मिल गई। पुस्तक उनके वर्तमान पद को इसी संकल्प से जोड़ती है। लोगों को सुधारने की इच्छा ने एक दायित्व दिया, और प्रतिशोध की भावना का कष्ट अलग बना रहा। प्रतिदिन सुबह, दोपहर और शाम दो यक्ष उन्हें गरम लोहे की रेत गले में डाले जाने का दंड देते हैं। हर बार पंद्रह मिनट तक यह क्रम चलता है; उसके बाद वे फिर सामान्य रूप से अपना काम सँभालते हैं। न्याय करने का उनका अधिकार और अपनी भावना का फल भोगना एक ही जीवन में उपस्थित हैं। इस विवरण में अच्छे काम की इच्छा के साथ मन में बचा क्रोध भी विचार का विषय बनता है: संकल्प का प्रत्येक अंश अपने अनुरूप फल रखता है।

किसी पद का नाम चलता रह सकता है, जबकि उसे सँभालने वाला व्यक्ति बदल जाता है। पुस्तक में पूर्वी पवित्र पर्वत से जुड़े अधिपति का इतिहास ऐसा ही है।‘दोंग-युए दादी’ (东岳大帝) नाम चीन के पूर्वी पवित्र पर्वत ताइशान से जुड़ता है; दादी दिव्य अधिपति का सम्मानसूचक संबोधन है। पान-ग्वान के बताए पद-इतिहास में सोंग राजवंश से पहले के दोंग-युए को फेंगदू भी कहा जाता था और वे सर्वोच्च अधिपति थे। आगे अपीलें बढ़ने का समय “सोंग राजवंश के बाद का तीन सौ पचासवाँ वर्ष” कहकर दिया गया है; उस सापेक्ष गणना का आरंभिक वर्ष उत्तर में खुलता नहीं है। तब निवास और दफ़्तर के लिए एक बड़ा भवन बना, सर्वोच्च अधिपति उसमें चले गए और मिंग-जुन कहलाए। वर्तमान दोंग-युए पहले न्यायालय के छिन-ग्वांग वांग थे। पदोन्नति के बाद वे अब बारह अधिपतियों में से एक हैं और मिंग-जुन के अधीन काम करते हैं। विस्तार के बारे में एक दूसरा कथन स्पष्ट रूप से 1⁠9⁠9⁠5 ईस्वी बताता है, जिसके बाद निर्माण और तेज़ हुआ। सर्वोच्च सुनवाई माँगने वाले मामले मिंग-जुन तक पहुँचते हैं; हर स्तर का निर्णय कर्म और यिन-ल्यू के विधान के अनुसार होता है।

स्थानीय संरक्षण और अभिलेख

ऊपर के न्यायाधिपतियों के निर्णय को दैनिक कार्य में लाने के लिए समझाने, लेखा सँभालने और संदेश पहुँचाने वाले अधिकारी भी चाहिए। पुस्तक में नियमों और घटनाओं की सबसे अधिक व्याख्या करने वाले अधिकारी को ‘पान-ग्वान’ (判官, न्यायाधिकारी) कहा गया है। लेखन के लिए नियुक्त होने पर वे आ-यू के प्रश्नों का उत्तर देते और दूसरे विभागों से संपर्क कराते हैं। उनका परिचय इसी पदनाम से मिलता है। परिशिष्ट में आए लू पान-ग्वान का कथन एक अलग पाठ का है। क्षेत्रीय लेखे के लिए ‘छंग-ह्वांग’ (城隍) का कार्यालय है: दक्षिणी जम्बूद्वीप में हुए जन्म, पूर्व जीवन की पहचान और कर्म वहाँ दर्ज हैं। बड़े शुभ कार्यों के लिए उसके ‘यिन-दे गोंग’ (阴德宫) विभाग का उल्लेख आता है; दूसरे लोक-प्रदेशों के जन्म अपने संबंधित अभिलेखों में आते हैं। स्थानीय रक्षक छंग-ह्वांग की सहायता करते और उनसे कार्यादेश लेते हैं। संदेश पहुँचाना, जीवन-अवधि पूरी होने पर जीव को लाना तथा उसे अगले स्थान तक पहुँचाना गुइ-छाइ और वू-छांग जैसे दूतों के कामों में आता है। द्वार-रक्षक प्रवेश देखते हैं। इस प्रकार जाँच, स्थानीय संरक्षण, संदेश और प्रवेश की व्यवस्था अलग हाथों से पूरी होती है।

क्षेत्रीय अभिलेखों का संबंध उन बस्तियों से भी है जहाँ लोग जन्म लेते, रहते और स्थान बदलते हैं। वहाँ नियुक्त रक्षक ‘तू-दी गोंग’ (土地公) कहलाते हैं। कोई जन्म, मृत्यु या क्षेत्र से विदाई हो, तो अधोलोक उसकी सूचना अथवा रिकॉर्ड इन रक्षकों तक पहुँचाता है। उनका काम अपने क्षेत्र की शांति, आने-जाने वाले लोगों और कल्याण का ध्यान रखना है। बड़े क्षेत्र के रक्षक के नीचे भवन, बाज़ार और दुकान सँभालने वाले नियुक्त रक्षक भी हैं। इस तरह एक ही पदनाम अलग आकार के कार्यक्षेत्रों में मिल सकता है। पुस्तक उनकी नियुक्ति को पहले जीवन के न्यायप्रिय और सहायता करने वाले स्वभाव से जोड़ती है। जीवन समाप्त होने पर उन्हें संरक्षण का यह दायित्व मिला। कुछ प्रसंगों में वे होने वाली घटना से पहले सहायता करते या सावधान करने का संकेत देते हैं, जिससे व्यक्ति को अपनी भूल सँभालने का अवसर मिले। छंग-ह्वांग का व्यापक लेखा और इन रक्षकों की स्थानीय देखभाल साथ काम करते हैं; जन्म-मृत्यु की सूचना किस ओर से आती है और कौन कितना क्षेत्र सँभालता है, इससे उनके कामों का संबंध स्पष्ट रहता है।

घर में इसी सम्मानसूचक नाम से पूजे जाने वाले प्राणी की एक दूसरी कहानी भी मिलती है। वह उस मकान का पुराना अदृश्य निवासी है। परिवार उसके नाम की पट्टिका रखकर अर्पण करता है, और वह उस उपकार के बदले परिवार की रक्षा करता है। मकान बिकने पर मनुष्य-मालिक बदल जाता है; यह निवासी अपने स्थान पर रहता है। इसलिए उसके परिचय में रहने का पुराना संबंध और अर्पण के लिए कृतज्ञता मुख्य बातें हैं, जबकि क्षेत्रीय रक्षक के परिचय में नियुक्ति, अधिकारी और कार्यक्षेत्र आते हैं। दोनों के लिए तू-दी का संबोधन सुनाई दे सकता है, पर उनकी जिम्मेदारी और वहाँ आने का कारण अलग हैं। नाम-पट्टिका तथा उसे रखने का पूजास्थल इस घरेलू अर्पण के साधन हैं। पट्टिका पर लिखा सम्मान उस प्राणी की पहचान को सामने रखता है; उसके काम का विवरण संबंध की बाकी बात समझाता है। किसी परिचित भारतीय रक्षक-देवता की स्मृति से संरक्षण का भाव समझ में आ सकता है, और इस चीनी वृत्तांत में घर, निवासी और परिवार के बीच यही विशिष्ट संबंध बना रहता है।

सूचना, जाँच और अनुमति

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