“दक्षिण जम्बूद्वीप के चीन देश की जीवित सामान्य स्त्री शांगगुआन युहुआ, फ़ेंगदू सम्राट के सम्मुख सिर झुकाकर प्रणाम करती है! कृपा करके फ़ेंगदू सम्राट मेरे अपराध क्षमा करें।”
मेरे सामने फ़ेंगदू सम्राट राजसी दरबारी वस्त्र पहने, सिर पर रत्नजटित मुकुट धारण किए, ऊँचे आसन पर बैठे थे। उनका मुख गहरा काला था और भाव अत्यंत गंभीर। उन्हें देखकर मन में आतंक और भय उत्पन्न होता था।
मैं सभा-कक्ष में लगातार घुटनों के बल बैठी रही। न उठी, न सिर उठाकर उनकी ओर देखने का साहस हुआ।
तब फ़ेंगदू सम्राट ने बोलना आरंभ किया: “मैं तुम्हारे आने का उद्देश्य जान चुका हूँ, इसलिए कृपा करके तुम्हें अपने सम्मुख बुलाया है। मनुष्यलोक के श्री तान, जिनका उपनाम वेनशु मोचिए है, सद्धर्म बताते हैं, धर्म के ह्रास के युग के सत्त्वों को शिक्षा देते हैं और लोगों के चित्त को शुद्ध करते हैं। आज मनुष्यलोक ऐसी स्थिति में पहुँच गया है जहाँ नैतिक धारणाएँ दिन-प्रतिदिन गिरती जा रही हैं और कर्म तथा उसके फल की शिक्षा का गंभीर अभाव है। लोग नहीं जानते कि भलाई का फल भला और बुराई का फल बुरा होता है। इसलिए वे किसी संकोच के बिना उन्मुक्त विचारधारा का व्यापक आचरण करते हैं—जीवहत्या, यौन दुराचार और व्यक्तियों की निंदा करते हैं, और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मानते हैं। वे नहीं जानते कि वे दूसरों और पवित्र शिक्षाओं की निंदा का अपराध कर चुके हैं। श्री तान जो बताते हैं, वह लोगों के चित्त को बचाने, उन्हें ऊपर उठाने और अपनी भूलें सुधारकर नया जीवन आरंभ करने का सद्धर्म है। जो कोई बुद्ध द्वारा बताए गए सद्धर्म की रक्षा और सहायता करता है, मैं उसके पुण्य का लेखा बढ़ाकर उसके अनुसार उसे पुरस्कृत कर सकता हूँ। यदि कोई बुद्ध की शिक्षाओं के अनुसार जीवन भर आचरण करे और उनका उल्लंघन न करे, तो भले ही वह उनका प्रचार न करके केवल अपनी साधना करे, उसे भी निश्चित रूप से नरक में दुःख भोगने नहीं आना पड़ेगा। यदि वह न केवल स्वयं जीवन भर उनका पालन करे और उल्लंघन न करे, बल्कि एक से दूसरे तक पहुँचाते हुए अन्य लोगों को भी बताए और उनका प्रसार करे, तो उसके शुभफल और आयु अवश्य बढ़ेंगे, और उसका लाभ उसकी आने वाली संतान तथा वंशजों को भी मिलेगा। यदि कोई स्वयं पालन न करे और जानबूझकर सद्धर्म को नष्ट करने तथा उसकी निंदा करने में भी लगे, तो इस जीवन में उसके शुभफल और आयु निश्चित रूप से घटेंगे। आयु पूरी होने पर वह जीभ खींचने वाले नरक और चीख-पुकार के नरक में जाएगा, और उसे आँखें खोदकर निकालने, हृदय नष्ट करने, कान काटने आदि नरक की क्रूर यातनाएँ भी भोगनी होंगी। जहाँ तक दंड की अवधि का प्रश्न है, जब तक सद्धर्म की निंदा करने वाली इन बातों पर विश्वास करने वाले सभी सत्त्वों में फिर से सम्यक् श्रद्धा उत्पन्न न हो जाए और वे पुनः सद्धर्म की साधना आरंभ न कर दें, तब तक प्रतीक्षा करनी होगी। उसके बाद ही निंदा करने वाली उस अपराधी आत्मा को नरक से बाहर निकलने का अवसर मिल सकता है। इसके बाद मनुष्य के रूप में जन्म लेने पर उसे नीच माने जाने वाले परिवेश में जन्म, अपूर्ण इंद्रियाँ, दोनों आँखों का अंधापन, बहरापन, दुर्बल और दुबला शरीर, अथवा दरिद्रता और हीन सामाजिक स्थिति, खराब रहने की परिस्थितियाँ, आवश्यक वस्तुओं का अभाव, पारिवारिक कलह और तरह-तरह की असफलताओं जैसे कठिन कर्मफल भोगने पड़ेंगे। तुम शीघ्र लौटकर मेरे कहे हुए शब्द लिखो। आशा है कि इससे हठपूर्वक मोह में पड़े सत्त्वों को समझाया जा सकेगा कि वे सद्धर्म की निंदा न करें, लौट आएँ और पश्चात्ताप करें।”
मैंने फ़ेंगदू सम्राट, यमराज और सभी प्रधान न्यायाधिकारियों को साष्टांग प्रणाम करके धन्यवाद दिया!
श्वेत कमल पर सवार होकर लौटती हूँ।
14/विद्युत्-प्रकाश की स्क्रीन—विद्युत्-युक्त बर्फ़ की सुइयाँ छोड़ने वाला नया नरक
बुद्ध की शक्ति के अनुग्रह के लिए कृतज्ञ हूँ! श्वेत कमल पर सवार होकर प्रस्थान करती हूँ।
मैंने परलोक के न्यायाधिकारी के सामने हाथ जोड़े!
परलोक के न्यायाधिकारी ने कहा कि आज वे मुझे विद्युत्-प्रकाश की स्क्रीन वाला नरक दिखाने ले जाएँगे।