“अच्छा! आ यू, आज के लिए इतना ही। लौटकर जल्दी लेख लिखो!”
अमिताभ बुद्ध! मैं, आ यू, परलोक के न्यायाधिकारी को साष्टांग प्रणाम करके आभार व्यक्त करती हूँ! श्वेत कमल पर सवार होकर लौटती हूँ!
24/बच्चे, माँ तुमसे प्यार करती है—परलोक के न्यायाधिकारी संसार की सभी माताओं को गंभीर और स्नेहपूर्ण शिक्षा देते हैं!
बुद्ध की शक्ति के अनुग्रह के लिए कृतज्ञ हूँ! श्वेत कमल पर सवार होकर प्रस्थान करती हूँ!
अमिताभ बुद्ध! मैं, आ यू, हाथ जोड़कर परलोक के न्यायाधिकारी को प्रणाम करती हूँ!
परलोक के न्यायाधिकारी ने कहा: “आ यू! तुम कुछ समय से नहीं आई हो!”
“जी, न्यायाधिकारी! मुझे, आ यू को, लज्जा आती है। हाल में सांसारिक कामों में बहुत व्यस्त रही हूँ। मुझे आपसे सीखकर दिन-रात सभी जीवों की सेवा करनी चाहिए। आगे अधिक बार आऊँगी।”
आज मैं, आ यू, परलोक के न्यायाधिकारी से गर्भपात के बाद की शिशु-आत्माओं के बारे में कुछ प्रश्न पूछना चाहती हूँ।
“न्यायाधिकारी, कृपया बताइए, जीवितों के लोक में गर्भपात करवाने वाली माताओं के सूत्र-पाठ और जीवों को मुक्त करने से उत्पन्न पुण्य क्या अन्यायपूर्ण मृत्यु के रुदन-नगर में रहने वाली शिशु-आत्माओं को मिल सकता है? कौन-सा सूत्र पढ़ना सबसे अच्छा है? कितना पाठ करने पर फल मिलता है? पुण्य मिलने के बाद शिशु-आत्माएँ कहाँ जाती हैं? क्या जीवित लोगों को शिशु-आत्माओं के लिए अपने घर या बौद्ध उपासना-गृह में स्मृति-पट्टिका स्थापित करनी चाहिए, ताकि वे धूप का अर्पण ग्रहण कर सकें और सूत्र-पाठ सुन सकें? क्या ऐसा करना उपयोगी है? क्या अन्यायपूर्ण मृत्यु के रुदन-नगर में शिशु-आत्माएँ बड़ी होती हैं? वे किससे अपना जीवन बनाए रखती हैं?”
परलोक के न्यायाधिकारी ने उत्तर दिया: “हाँ, उन्हें पुण्य मिलता है। जीवितों के लोक में माता-पिता या संबंधी जो भी शुभ कार्य करते हैं और उनका पुण्य जिस निर्दिष्ट उद्देश्य से समर्पित करते हैं, उसके अनुसार हम शिशु-आत्माओं को उसका भाग देते हैं। उदाहरण के लिए, जीवों को मुक्त करना, सूत्र-पाठ करना, बुद्ध को अर्पण करना, दान देना, पुल बनवाना और सड़क बनवाना आदि। पुण्य अधिक हो, तो शिशु-आत्मा को मिलने वाला भाग भी उसी अनुपात में अधिक होता है; पुण्य कम हो, तो उसका भाग भी कम होता है। प्रत्येक शुभ कार्य का पुण्य कितना होगा, यह उस कार्य को करने वाले की प्रेरणा पर निर्भर करता है। अर्थात, यदि भलाई करने वाले का उद्देश्य सभी जीवों को दुःख से निकालकर सुख देना तथा संकट और पीड़ा से बचाना हो, बदले में कुछ पाने का लेशमात्र भी विचार न हो और भलाई करने के बाद मन उसमें अटका न रहे, तो पुण्य बिना माँगे अपने आप मिलता है। ऐसा व्यक्ति असीम, अपरिमित और विशाल पुण्य प्राप्त कर सकता है। यदि यह असीम, अपरिमित और विशाल पुण्य अन्यायपूर्ण मृत्यु के रुदन-नगर की शिशु-आत्मा को समर्पित किया जाए, तो वह गर्भपात के 49 दिनों के भीतर अवश्य ऊपर उठकर सुगति में पहुँच सकती है। जहाँ तक पुण्य के बँटवारे की बात है, यदि पुण्य के 7 भाग हों, तो जीवितों के लोक में भलाई करने वाले को 6 भाग मिलते हैं और परलोक की शिशु-आत्मा को 1 भाग मिल सकता है।”27