अरे! फिर एक अत्यंत विशाल क्षेत्र! मेरी क्षमता से इसका अंत दिखाई नहीं देता, और यह तो बाद में बनाया गया विस्तार है। सचमुच अकल्पनीय!
न्यायाधिकारी बोले, “आ यू, आज पहले इनमें से झूठ बोलने के एक नरक को देखिए। बाकी देखने के लिए बाद में उपयुक्त समय तय करेंगे।”
न्यायाधिकारी का आभार! यहाँ तापमान बहुत कम है, कितनी ठंड है! अभ्यस्त होना कठिन लग रहा है। मनुष्यलोक के उत्तर और दक्षिण में सर्दियों के तापमान में बड़ा अंतर होता है, फिर भी मैं उसके अनुकूल हो सकती हूँ; लेकिन इस नरक का तापमान वास्तव में बहुत कम है। बहुत ठंड है! मुझे तुरंत बुद्ध-नाम का स्मरण करके अपने मनोबल को सँभालना होगा, ताकि इस अत्यंत बर्फ़ीले वातावरण के अनुकूल हो सकूँ।
न्यायाधिकारी बोले, “यहाँ तापमान शून्य से 150 डिग्री नीचे है। मनुष्यलोक के समय के अनुसार वर्ष 2000 में झूठ बोलने वाले नरकों का यह नया क्षेत्र बनना शुरू हुआ। अभी हम इस क्षेत्र के सबसे कठोर दंड वाले ‘बर्फ़ीली ठंड में जीभ उखाड़ने और शरीर को चूर-चूर करने वाले नरक’ में हैं। यहाँ अत्यंत ठंड और अत्यंत पीड़ा है। परलोक के दक्षिण में दस सभागृहों वाले पुराने क्षेत्र में झूठ बोलने का एक पुराना नरक है, जिसकी दंड-पीड़ा इससे एक स्तर कम है। आह! आज संसार की नैतिक दशा गिर चुकी है और मनुष्य निर्दयी हो गए हैं। यहाँ बहुतों ने जीवित रहते झूठ बोलकर लोगों को आत्मसंयम और अंतःसाधना का पवित्र जीवन छोड़ने पर लगाया। उनके झूठ पर विश्वास करके वे लोग इधर-उधर भटकते रहे और पाँच इंद्रिय-विषयों में डूबकर बेसुध जीवन बिताने लगे। दूसरों के प्रज्ञामय जीवन का नाश करने के कारण, आयु समाप्त होने पर वे इस बर्फ़ीली ठंड में जीभ उखाड़ने और शरीर को चूर-चूर करने वाले नरक में आ गिरे। आ यू, आज पहले यही नरक देखिए!”
मेरे बताए बिना भी सब जानते हैं कि नरक की विशेषता है—चीखें, पीड़ा की पुकारें और भयभीत चीत्कार कभी नहीं रुकते। लेकिन यहाँ की पीड़ा को देखकर ऐसा लगता है मानो ठंड ने समय और स्थान तक की गति धीमी कर दी हो; सब कुछ बहुत धीरे होता प्रतीत होता है।
“बर्फ़ीली ठंड में जीभ उखाड़ने और शरीर को चूर-चूर करने वाला नरक”—प्राचीन काँस्य के रंग वाले ये बड़े अक्षर आँखों के सामने आए। इस नरक का प्रवेशद्वार बहुत आधुनिक दिखता था। द्वार के यक्षों ने हमें देखकर न्यायाधिकारी को प्रणाम किया और हमारे भीतर जाने के लिए द्वार खोल दिया।
यह नरक अत्यंत विशाल था। मैंने भीतर असंख्य लोगों को पीड़ादायक दंड भोगते देखा। बाईं ओर कुछ अपराधी आत्माएँ लगभग एक जैसी कर्मफल-यातना भोग रही थीं। भीतर बहुत-से कंप्यूटर यातना-यंत्र थे। प्रत्येक कंप्यूटर स्वचालित था और भीतर से यातना के कुछ उपकरण छोड़कर अपराधी आत्माओं का पीछा करता था। उनका निशाना बिल्कुल सौ प्रतिशत सही होता था; कोई आत्मा बच नहीं पाती थी। दीवारों और छत में भी यांत्रिक व्यवस्थाएँ थीं, जिनसे यातना के उपकरण उड़कर निकलते थे। यह आधुनिक नरक था। यक्ष छिपने की कोशिश करने वाली आत्माओं पर क्रुद्ध होने के साथ-साथ उन्हें दंडित करने के लिए इतने सारे कंप्यूटर चलाने में भी व्यस्त थे। यहाँ की आत्माओं की पीड़ा सचमुच असीम थी: उन्हें अत्यंत खूंखार यक्षों के साथ निर्दय कंप्यूटर यातना-यंत्रों का भी सामना करना पड़ता था। इस नरक में आत्माएँ और कंप्यूटर यातना-यंत्र बहुत थे, यक्ष कम। पहले दीवार के पास की इन दो आत्माओं को देखें—एक पुरुष और एक स्त्री, दोनों एक ही कर्मफल भोग रहे हैं।
वह स्त्री आत्मा ठंड से थोड़ा-थोड़ा काँपने लगी थी। बड़ी कठिनाई से और अत्यंत धीमी गति से वह ज़मीन से उठी और अंततः सामान्य मनुष्य जैसी हो गई। तभी एक खूंखार यक्ष ने उसकी पीठ में भाला घोंप दिया। स्त्री आत्मा दर्द से चिल्लाई और यक्ष उसे भाले पर उठाकर पास के एक डेस्कटॉप कंप्यूटर के पास ले गया। कंप्यूटर की स्क्रीन से एक क्षण में दो साँप उड़े—एक काला, एक लाल। दोनों उसकी ओर झपटे और मुँह पर टूट पड़े। लाल साँप ने मुँह काटकर फाड़ दिया, काले ने उसकी जीभ काटकर बाहर खींची, तोड़कर ज़मीन पर फेंक दी। इसके बाद, आश्चर्यजनक रूप से, फिर एकदम सही निशाने से उड़कर उसके खून और मांस से लथपथ मुँह में लौटना संभव था।109
कंप्यूटर से और भी बहुत-सी नुकीली वस्तुएँ उड़कर आत्मा के शरीर पर गिरीं। वे बहुत तेज़ चाकुओं जैसी दिखती थीं—ऐसी वस्तुएँ मैंने मनुष्यलोक में नहीं देखी थीं—और कीलों जैसी भी लगती थीं। उन उपकरणों के शरीर में धँसते ही स्त्री आत्मा असह्य पीड़ा से गिरकर बेहोश हो गई। बेहोश होने के बाद बहुत-से कीड़े उसका शरीर खाने आए। उसका रक्त चारों ओर छिटका; ज़मीन पर बहा रक्त भी अंततः कीड़ों ने पूरी तरह चूस लिया। कर्मबल के कारण आत्मा फिर होश में आ जाती थी और इस प्रकार बार-बार यही यातना भोगती थी।
पुरुष आत्मा भी यही कर्मफल भोग रही थी। कुछ आत्माओं के मुँह पर यक्ष दोनों ओर से कीलों वाले लोहे के डंडे मार रहे थे। कुछ ही प्रहारों में मुँह फटकर खून बहने लगा। फिर उन्हें घसीटकर दूसरे प्रकार की कंप्यूटर-मेज़ पर ले जाते थे। वहाँ काले कनखजूरों जैसे डरावने कीड़े आत्मा के मुँह का सारा रक्त चूस लेते थे और साथ ही उसकी जीभ को धीरे-धीरे खा जाते थे। इसके बाद उड़ती सुइयाँ निकलकर उसका मुँह सिल देती थीं। कुछ आत्माओं को यक्ष मुँह और सिर में हुक फँसाकर कंप्यूटर-मेज़ तक घसीटते थे और उनका रक्त लगातार बहुत अधिक बहता रहता था।