न्यायाधिकारी! आज मैं पूछना चाहती हूँ: मनुष्य यदि फूट डालने वाली वाणी का अपराध करे, तो क्या नरक में दंड भोगना पड़ता है?”
न्यायाधिकारी बोले, “मनुष्य का फूट डालने वाली वाणी का अपराध गंभीर हो तो नरक में दंड भोगना पड़ता है। फूट डालने वाली वाणी का अर्थ है कि कोई व्यक्ति दो या अधिक लोगों को किसी घटना के परस्पर विपरीत संस्करण अलग-अलग सुनाए, दुर्भावना से उनके संबंध तोड़े और भावनाओं को नुकसान पहुँचाए, जिससे वे झगड़ें या दुर्भावनापूर्ण संघर्ष करें।
परलोक के विधान में कर्मफल का नियम सबसे पहले मनोभाव देखता है, अर्थात कर्म में उतारने से पहले के विचार। इन्हीं विचारों से सारे शब्द और शारीरिक कर्म प्रेरित होते हैं। जब मनुष्य सोचता है कि दुर्भावना से फूट कैसे डाली जाए, तभी नरक के लिए प्रारंभिक कारण-प्रत्यय बो दिए जाते हैं। फूट डालने वाली वाणी लोभ, द्वेष और मोह के तीन विषों तथा झूठ की साथी है।
फूट डालने वाली वाणी के अपराध में भी गंभीर और हल्के स्तर का भेद है। गंभीर अपराध वह है जिसमें मनुष्य के तन-मन से जुड़े विभिन्न हितों को हानि पहुँच चुकी हो; ऐसे व्यक्ति को निश्चित रूप से नरक में कर्मफल भोगना होगा। हल्के अपराध में ऐसा भी होता है कि केवल दोनों पक्षों के हित के लिए, अपने किसी व्यक्तिगत लाभ के बिना, दूसरों की सहायता की भावना से, दोनों के स्वभाव और मिज़ाज के अनुसार अलग-अलग संस्करण कहा जाए। सबके बीच मेल कराने की भावना से ऐसी दोहरी वाणी की भूमिका निभाना हल्का अपराध है। हल्का अपराध करने वाले जीवित रहते पश्चात्ताप करके उसे शुद्ध कर सकते हैं और उन्हें नरक में दंड भोगना नहीं पड़ेगा। पश्चात्ताप का विवरण वही है जो पिछले लेख में सुविधा के लिए बोले गए असत्य के पश्चात्ताप के बारे में समझाया गया है। केवल ‘सुविधा के लिए बोला गया असत्य’ के स्थान पर ‘फूट डालने वाली वाणी’ कर दें; शेष पश्चात्ताप समान है।
आज बहुत-से मनुष्य फूट डालने वाली वाणी के अपराधी हैं; बच्चे भी माता-पिता के पीछे चलकर फूट डालने वाली बातें और झूठ बोलते हैं। समाज का वातावरण बिगड़ने का यह एक महत्त्वपूर्ण कारण है। भाषा सामूहिक जीवन में संवाद का महत्त्वपूर्ण साधन है। उपदेश से बढ़कर स्वयं उदाहरण देना है। माता-पिता को वचन और कर्म में एकरूपता का अच्छा उदाहरण बनना चाहिए; तब बच्चे भी धीरे-धीरे उनका अनुसरण करते हुए अच्छे बनेंगे।
मनुष्य का मूल स्वभाव अच्छा है। आचरण का अच्छा उदाहरण हममें से प्रत्येक को स्वयं से शुरू करना चाहिए। सब सार्वजनिक कर्तव्य और कानून का पालन करें और परलोक के विधान के कर्मफल-नियम का उल्लंघन न करें, तो मानवजाति का उद्धार निश्चित है और विपत्तियाँ अवश्य कुछ समय के लिए टलेंगी। स्वर्ग में जीवन-रक्षण का सद्गुण है; वह सच्चे पश्चात्ताप वाले प्राणियों के धीरे-धीरे सुधरने के लिए प्रकाश की ओर एक सीढ़ी अवश्य छोड़ता है। चिंता बस यह है कि आपमें पश्चात्ताप का भाव ही न उठे।
आ यू! अब आपको उस नरक में ले चलूँ जहाँ जीवित रहते फूट डालने वाली वाणी के अपराधी जाते हैं।” समय सीमित था, इसलिए हम बहुत तेज़ी से झूठ बोलने वाले नरकों के क्षेत्र के सुदूर उत्तर पहुँचे और नक्शे वाले एक दिशासूचक के सामने उतरे। ‘दाएँ-बाएँ दौड़ने का नरक’ बाईं ओर था और ‘काली सुइयों से जीभ बेधकर मुँह बंद करने का नरक’ दाईं ओर। किस ओर जाएँ? बुद्धबल के अधिष्ठान से प्राप्त अंतर्दृष्टि से देखूँ कि दोनों में क्या अंतर है। बाईं ओर का नरक बड़ा था और वहाँ दुख भोगने वाले सत्त्व अधिक थे, पर दाईं ओर का नरक अधिक दयनीय था। बाईं ओर ही चलें!
संयोग से न्यायाधिकारी भी चाहते थे कि मैं दाएँ-बाएँ दौड़ने का नरक देखूँ। हम शीघ्र वहाँ पहुँच गए और उन्होंने द्वार के यक्ष को मेरे कार्य का परिचय दिया। द्वार खुला—अरे! फिर एक अत्यंत विशाल नरक। पहले सामने देखें! जितना मेरी दृष्टि में था, वह बाएँ और दाएँ दो भागों में बँटा था। बाईं ओर बहुत-सी आत्माएँ पीड़ा और विवशता में दाएँ-बाएँ दौड़ रही थीं। सबके मुँह से खून बह रहा था। वे जैसे भी दौड़ें, कंप्यूटर द्वारा जीभ छीनने वाले पीछा-तंत्र से बच नहीं पाती थीं।
नरक में लोहे के हथौड़े, लंबी तलवारें और भाले लिए बहुत-से खूंखार यक्ष आत्माओं को व्यवस्थित रख रहे थे और उन्हें यातना देने वाले कंप्यूटरों की सीमा से बाहर नहीं जाने देते थे। हर आत्मा की जीभ का कंप्यूटर से छूटे उपकरण सटीक पीछा करते थे। हर कंप्यूटर एक निश्चित क्षेत्र की आत्माओं को अपने-आप दंडित करता था। किसी आत्मा के उसकी सीमा में आते ही कंप्यूटर पाँच कीलनुमा ब्लेड छोड़ता, जो उसकी जीभ काटते थे; पहले कीलों से जीभ बाहर खींची जाती थी।
इस पीड़ित स्त्री आत्मा को देखें, जो अभी-अभी यहाँ आई है! उसका चेहरा भयभीत था, पैर चलने में असमर्थ थे। एक खूंखार यक्ष ने भाला घोंपकर उसे यातना-क्षेत्र में धकेल दिया। ओह! उसकी पीठ में बहुत दर्द था और रक्त बह रहा था। कंप्यूटर ने तुरंत “बीप, बीप” की दो आवाज़ें निकालीं, आत्मा का नाम कहा, फिर उसी क्षण उसके मुँह की ओर निशाना करके कीलनुमा ब्लेड छोड़े। यह देखते ही स्त्री आत्मा पीठ के दर्द को दबाते हुए चीखकर दाएँ-बाएँ भागने लगी।