“मनुष्यलोक में कोई उचित व्यवसाय करते और बड़ा अपराध न करते, तो विशेष भलाई, मार्ग-साधना या पुण्यसंचय न करने पर भी अपने पुण्यफल से अभी सुखी जीवन जी रहे होते। इस तरह नरक में असीम, अनंत दुख भोगने न गिरते।”
परलोक के अधिपति यमराज: “एकाकी आत्माओं के यक्ष!”
एकाकी आत्माओं के यक्ष: “उपस्थित!”
परलोक के अधिपति यमराज: “इसे तुरंत अकेली आत्मा द्वारा तलवारों के समुद्र में अकेले काँटा डालने के नरक में दंड भोगने ले जाओ, ताकि कर्म-ऋण चुकाए!”
अपराधी आत्मा: “हूँ—हूँ—हूँ… अब सचमुच पछताता हूँ कि पहले मेरा लोभ कितना अधिक था। संपत्ति लगातार बढ़ाना चाहता था, लेकिन तरीका गलत था। महोदया, मैंने जो कहा है, उसे पूरा अवश्य लिखिए। आशा है मेरे मित्र पढ़कर तुरंत सुधार करेंगे और मछली पकड़ना तथा उन दुकानों को चलाना छोड़ देंगे।”
“महोदया, इसे मेरी विनती समझिए! अभी कही बातें लिख दीजिए। मेरे मित्र पढ़ेंगे तो अवश्य जान जाएँगे कि मैं नरक में दुख भोग रहा हूँ। तब वे मेरे पारिवारिक मामलों और कुछ विचारों को जानते थे, इसलिए आपके लिखे को सच मानेंगे और पढ़ने के बाद अवश्य बदलेंगे। यदि वे शीघ्र सुधार करके मछली पकड़ने और जीवहत्या के अकुशल कर्म छोड़ दें, तो मेरा नरक में दुख भोगने का समय भी कम हो सकता है! हूँ—हूँ—हूँ… कोई नहीं चाहता कि भविष्य में नरक की असीम पीड़ा भोगे। हूँ—हूँ—हूँ… मैं सचमुच यहाँ से निकलना चाहता हूँ। दस हज़ार वर्ष कितने लंबे होते हैं! हूँ—हूँ—हूँ…”
आ यू: “आपने जिस शहर का उल्लेख किया, मैं उसे जानती हूँ। वहाँ जीवहत्या के कर्म बहुत भारी हैं। तो आप इतना भारी काला कर्मबल ढो रहे थे। ‘परलोक के अटल विधान’ अच्छी तरह लिखना मेरा कार्य है; आपने अभी जो कहा, उसे पूरा और अखंड अवश्य लिखूँगी। आपको बुद्ध-नाम स्मरण करना चाहिए। बुद्धबल करुणा से आपको अधिष्ठान देगा। मैं भी पुस्तक लिखने का पुण्य आपको समर्पित करूँगी, ताकि आप शीघ्र दुख छोड़कर सुख पाएँ।”
अपराधी आत्मा: “हूँ—हूँ—हूँ… अभी जैसे हम बात कर रहे हैं, शरीर में दर्द तो है, फिर भी उसे सहकर बुद्ध-नाम स्मरण कर सकता हूँ। लेकिन थोड़ी देर में यातना फिर शुरू होगी; पीड़ा बहुत बढ़ेगी और उसमें कोई विराम नहीं होगा, चक्कर तथा चेतना का भ्रम रहेगा। तब नाम बिल्कुल नहीं निकलता। हूँ—हूँ—हूँ… कामना है कि संसार का कोई व्यक्ति कभी मछली न पकड़े, नरक में दुख भोगने न गिरे। किसी की दशा मेरी जैसी न हो—मरने के बाद भी अंत न दिखाई देने वाला नरक-दंड! हूँ—हूँ—हूँ…”
न्यायाधिकारी: “अच्छा! समय सीमित है। आज तुमने बहुत सहयोग करके आ यू को पुस्तक के लिए जानकारी दी और शुभ कामना भी की कि संसार के सभी लोग मछली पकड़ना छोड़ें और नरक में दुख न भोगें। इसे ध्यान में रखकर मैं तुम्हारा एक शुभ कर्म दर्ज करता हूँ। तुम्हें एक बार क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व का उपदेश सुनने की अनुमति है, ताकि कुछ समय पीड़ा थमे।”
एकाकी आत्माओं के यक्ष: “जी, न्यायाधिकारी! अभी इसे ले जाता हूँ।”