“प्रचार के बाद थोड़े समय में कंपनी का कारोबार और ऊँचे स्तर पर पहुँच गया। मुझे लगा कि मैं निवेश करना जानता हूँ, इसलिए कंपनियों, व्यक्तियों और समूहों में अधिक ज़ोर से प्रचार किया। मछली पकड़ने और नदी में नौकाविहार वाले आनंदमय जन्मदिन समारोह, पूर्ण पैकेज जैसी गतिविधियाँ आयोजित कीं। रुचि रखने वाले समान विचार के लोगों की मछली पकड़ने वाले रेस्तराँ और उपकरणों की दुकानें आदि खोलने में भी सहायता की। फिर सोचा कि पूरी ऊर्जा लगाकर अपनी मछली पकड़ने की कंपनी के आगे के विकास का सुंदर खाका बनाऊँ।”
“संपत्ति लगातार बढ़ी तो मैं रहने का स्तर भी बढ़ाकर धनवान लोगों के क्षेत्रों में जाने लगा। हम तीनों परिवारजन कई हज़ार ‘ची’ (尺) माप वाले एक बड़े विला117 में रहने चले गए; घर में कई सेवक थे। पर अच्छे दिन स्थायी नहीं रहे। वहाँ रहने आए तीन महीने भी नहीं हुए थे कि मेरा बेटा बहुत संवेदनशील और डरपोक हो गया। दिन भर भय में कहता कि कोई उसे मारेगा, जबकि घर में कोई ऐसा नहीं था। पत्नी को कमरदर्द और अवसाद था; वह रोज़ बहुत क्रोध करती, मुझ पर विवाहेतर संबंध का संदेह करती आदि। घर के नौकर लगातार बदलते रहते थे।”
“पत्नी और बेटे ने मनोचिकित्सक से इलाज कराया, दवाएँ लीं और इंजेक्शन लगवाए, लेकिन स्थिति सुधरने के बजाय और गंभीर हुई। बाद में घर में थोड़ी-सी अचानक आवाज़ होते ही बेटा डरकर छिप जाता। पहले मासूम और चंचल बेटा तेज़ रोशनी से भयभीत होता और अँधेरे स्थान पसंद करता। घर में सीधी धूप न आए, इसलिए सारे परदे बंद रखने पड़ते थे। पत्नी के साथ संबंध खराब थे और घर पर डाँट पड़ती थी, जिससे मेरा मन खराब रहता। मन बहलाने के लिए रोज़ मित्रों के साथ शराब पीने और कराओके गाने जाने लगा। वहाँ एक युवती से विवाहेतर संबंध भी बना। वह दो बार गर्भवती हुई और मैंने उसे गर्भपात कराने के लिए उकसाया।”118
“मैं मद्य और भोग-विलास का जीवन बिताने लगा, कभी घर भी नहीं लौटता था, हालांकि बेटे का खयाल मन में रहता था। एक बार शराब के नशे में बुखार के साथ बेहोश हो गया और एंबुलेंस मुझे अस्पताल ले गई। वहाँ जाँच में अंतिम अवस्था का यकृत कैंसर निकला। तीन महीने की तरह-तरह की पीड़ाएँ सहने के बाद विवशता और दुख में संसार छोड़ दिया। हूँ—हूँ—हूँ… मैं ठीक से समझ भी नहीं पाया था कि क्या हुआ, तभी अचेत-सी अवस्था में बैलमुख और अश्वमुख लोहे की ज़ंजीरों से मुझे घसीटकर नरक ले आए।”
परलोक के अधिपति यमराज ने मेज़ पर हाथ पटककर क्रोध में कहा, “xxx, क्या अपना अपराध जानते हो? भरपूर पुण्यफल लेकर मनुष्यलोक में जन्मे, पर उसका उचित उपयोग करके भलाई और पुण्य का संवर्धन नहीं किया। उलटे उसका दुरुपयोग करके जीवहत्या और प्राणहानि के उद्योग में लगे, दूसरों को भी उसमें लगाया, लोगों की सोच को गंभीर रूप से बिगाड़ा और उनकी करुणा का नाश किया।”
“इस जीवन का तुम्हारा सबसे भारी अकुशल कर्म मछली पकड़कर जीवहत्या करना है। पहले इसे अकेली आत्मा द्वारा तलवारों के समुद्र में अकेले काँटा डालने के नरक में 10000 वर्ष का दंड भुगतने ले जाओ। मनुष्यलोक में तुम्हारे कारण खुली सारी मछली पकड़ने की दुकानें बंद हो जाएँ, तभी तुम मेरे सामने फिर आ सकते हो। उसके बाद दूसरे अपराधों का निर्णय होगा।”
आत्मा भय से ज़ोर-ज़ोर से सहायता माँगते हुए घुटनों के बल बैठकर अधिपति यमराज से पूछने लगी, “मेरी दुकान तो केवल आठ वर्ष चली। मुझे नरक में 10000 वर्ष का दंड कैसे मिल सकता है? और सभी दुकानों के बंद होने की प्रतीक्षा क्यों? दूसरी दुकानों से मेरा क्या संबंध है? मैं उनका हिस्सेदार भी नहीं हूँ।”
अधिपति यमराज ने क्रोध में आगे कहा, “मनुष्यलोक की जिन दुकानों ने तुम्हारे विज्ञापन और प्रचार से प्रेरित होकर काम शुरू किया, परलोक के कर्मफल के इस खाते में उनका पचास प्रतिशत कर्मबल तुम वहन करोगे और पचास प्रतिशत दुकान का मालिक। मालिक दूसरी शाखा खोले तो तुम तीस प्रतिशत और वह सत्तर प्रतिशत वहन करेगा। तुम्हारे विज्ञापन का प्रभाव न होता तो हत्या-कर्म वाली ये दुकानें न खुलतीं। जो दुकानें तुम्हारे विज्ञापन से आकर्षित होकर नहीं खुलीं, परलोक उनका हिसाब मनमाने ढंग से तुम्हारे नाम नहीं लिखेगा।”
“परलोक के महत्त्वपूर्ण कर्मचारियों का आधार शील पालन है। शीलधारी के शरीर में प्रकाश होता है; शील-सद्गुण जितना शुद्ध, पद उतना ऊँचा। मूलतः अब तुम मनुष्यलोक में अत्यंत धनी और प्रतिष्ठित, स्वस्थ तथा फलते-फूलते परिवार वाले व्यक्ति होने चाहिए थे। किसी पिछले जन्म में तुम बड़े परोपकारी थे; दान से बड़ा पुण्यफल संचित किया और इस जीवन में उसके शुभ फल के पकने का अवसर आया। इसलिए इस जन्म में किसी भी उद्योग में लगते, वह समृद्ध होता; लोगों से अच्छे संबंध भी जुटते और संपत्ति अभी की दुगुनी होती। लेकिन जन्म लेने के बाद लगातार मछली पकड़ते रहे। पढ़ाई पूरी करके भी समुद्री खाद्य पदार्थों का थोक कारोबार करने लगे। उससे कमाया सारा पैसा पुण्यफल की हानि करके आया था।”
“समुद्री खाद्य पदार्थों के थोक कारोबार ने इस जीवन का आधा पुण्यफल शीघ्र नष्ट कर दिया। परलोक ने कई बार स्वप्न-संकेत दिए: तुमने सपनों में देखा कि समुद्री जीव तुम्हें खा रहे हैं और तुम्हारी जान लेने के लिए तुम्हारा पीछा कर रहे हैं। वे सपने चेतावनी थे कि अब रुक जाओ, उचित उद्योग अपनाओ और जीवहत्या के अकुशल कर्मों में पुण्यफल न गँवाओ। लेकिन तुममें कोई जागरूकता, आत्मनिरीक्षण या पश्चात्ताप नहीं उठा। अहंकार और लोभ का विष बढ़ाते रहे, भलाई और सद्गुण भी नहीं जोड़े। उलटे जीवहत्या वाली मछली पकड़ने की दुकानों का प्रचार और विस्तार करते रहे तथा अप्रत्यक्ष रूप से मनुष्यलोक के मछली पकड़ने वाले रेस्तराँ उद्योग को बढ़ाया। परलोक के कर्मफल का यह ऋण तुम्हें नरक में धीरे-धीरे दुख सहकर चुकाना है।”