“जी, न्यायाधिकारी!” मैंने हाथ जोड़कर आभार व्यक्त किया!
श्वेत कमल पर सवार होकर लौटती हूँ।
20/गर्भपात का कर्मफल और शिशु आत्माओं की अन्यायपूर्ण मृत्यु का रुदन-नगर
बुद्ध के अधिष्ठान के लिए आभार! श्वेत कमल पर सवार होकर प्रस्थान करती हूँ!
अमिताभ बुद्ध!
न्यायाधिकारी! आज मैं आपसे गर्भपात के कर्मफल के बारे में पूछना चाहती हूँ।
न्यायाधिकारी: “गर्भपात के लिए परलोक में कठोर दंड दिया जाता है। परलोक के विधान में तीन प्रकार के गुप्त पुण्य निर्धारित हैं: पहला, किसी का जीवन बचाना; दूसरा, विधवा को अपना सतीत्व बनाए रखने में सहायता देना; तीसरा, ऐसा परम सत्कर्म करना जिसके बारे में किसी को पता न चले। कर्मफल के नियम में गुप्त पुण्य भाग्य बदलने के लिए पर्याप्त है। प्राचीन काल से आज तक इसके अनेक प्रसिद्ध उदाहरण हैं—गुप्त पुण्य के कारण ही लोग मानव लोक में उच्च अधिकारी और प्रतिष्ठित व्यक्ति बने तथा उनके वंशज यशस्वी हुए। तांग राजवंश के प्रधानमंत्री दी रनजिए जब युवा अवस्था में परीक्षा देने राजधानी जा रहे थे, तब एक सराय में ठहरे। देर रात उस सराय की सुंदर विधवा मालकिन ने उन्हें रिझाने का प्रयास किया, जिससे वे सतर्क हो गए। अपने दृढ़ और सच्चरित्र मन के कारण उन्होंने न केवल सावधानी से यौन दुराचार से स्वयं को बचाए रखा, बल्कि उस सुंदर विधवा को स्त्रीधर्म की मर्यादा बनाए रखने के लिए भी समझाया। उन्होंने अपने भीतर कामवासना शांत करने के लिए अपनाई जाने वाली शरीर की अशुचिता पर चिंतन की विधि उसे ध्यानपूर्वक सिखाई। उस स्त्री ने इस प्रकार चिंतन किया तो उसके मन में लज्जा उत्पन्न हुई और उसने आजीवन निष्ठा तथा धर्म की मर्यादा निभाई। बाद में दी रनजिए का नाम संसार भर में प्रसिद्ध हुआ, क्योंकि उन्होंने सहज ही सामने आ गए इस रूप-प्रलोभन का लोभ नहीं किया था। यदि मानव लोक के लोग अपने भाग्य में निर्धारित कर्म-संबंधों की परीक्षा पार कर सकें, शुद्ध शील का दृढ़ता से पालन करें और अपने उच्च चरित्र को अक्षुण्ण रखें, तो स्वर्गीय व्यवस्था निश्चित ही उनके साथ अन्याय नहीं करेगी। परलोक के विधान के अनुसार भी उनके व्यक्तिगत जीवन-मृत्यु के अभिलेख में पुरस्कारस्वरूप महान सत्कर्म का गुप्त पुण्य अवश्य जोड़ा जाएगा, जिससे उनकी आशीष और प्रज्ञा बढ़ेंगी। गर्भपात वास्तव में किसी जीव का जीवन छीनना है और यह प्राणिहत्या से विरत रहने के शील का उल्लंघन है। बच्चा अभी जन्मा भी नहीं होता और स्वभाव से निष्कपट होता है, फिर भी उसे मार दिया जाता है। यह माता-पिता की हत्या करने और बुद्ध के शरीर से रक्त बहाने के समान अपराध है। साथ ही, इससे बच्चे के साथ एक बुरा कर्म-संबंध भी बनता है। जैसा कहा जाता है, न उपकार हो, न बैर, तो पारिवारिक संबंध नहीं बनता।
बच्चों और माता-पिता का कर्म-संबंध दो प्रकार का होता है: ऋण वसूलने का और ऋण चुकाने का। यदि बच्चा ऋण चुकाने आया था, लेकिन मारे जाने के कारण उसके मन में द्वेष उत्पन्न हो गया, तो वह संबंध बुरा कर्म-संबंध बन जाता है। यदि बच्चा पहले से ही ऋण वसूलने आया था, तो बात और भी कठिन हो जाती है। बुरे कर्म-संबंध में क्रोध और द्वेष जुड़ने से ऋणग्रस्त होने का कर्म-संबंध और गहरा हो जाता है।
गर्भपात की तीन स्थितियाँ होती हैं। पहली, माता-पिता जानबूझकर गर्भपात नहीं करवाते, बल्कि बच्चे का पुण्यफल पर्याप्त नहीं होता। उदाहरण के लिए, गर्भ में ही भ्रूण की मृत्यु हो जाना, मोलर गर्भावस्था होना या गर्भवती स्त्री का बीमार होना आदि विभिन्न कारणों से शिशु जन्म नहीं ले पाता। यदि ऐसा कारण हो, तो बड़ों को पश्चात्ताप करना चाहिए, सूत्रपाठ करके शिशु के उद्धार के लिए पुण्य समर्पित करना चाहिए, ताकि वह शीघ्र दुःख से मुक्त होकर सुख प्राप्त कर सके।
दूसरी, खराब आर्थिक स्थिति के कारण गर्भपात करवाना। परलोक का विधान इसकी अनुमति नहीं देता। आर्थिक समस्या के कारण प्राणिहत्या नहीं की जा सकती। किसी स्थिति से निपटने का तरीका बहुत महत्त्वपूर्ण है। मानव लोक में चाहे कितना भी कष्ट सहना पड़े, वह गर्भपात के बाद नरक में उतरकर कर्मफल भोगने से एक करोड़ गुना बेहतर है। यह अवश्य याद रखना! यह भी संभव है कि वह शिशु उपकार चुकाने आया हो और उसके जन्म के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति बदलकर समृद्ध और सुख-संपन्न हो जाए। बेशक, यह प्रत्येक वास्तविक मामले पर निर्भर करता है। इस प्रकार गर्भपात करवाने से जीवनकाल में पुण्यफल घटेगा—स्वास्थ्य, कामकाज, धन-सौभाग्य आदि, सब कम हो जाएँगे—और तलवारों के वन के नरक में उतरकर 1000 वर्ष तक कर्मफल भोगना पड़ेगा। यदि वे अविवाहित हों, तो पहले कोड़ों और डंडों के नरक में 500 वर्ष तक कर्मफल भोगना होगा। उसके बाद मनुष्य के रूप में पुनर्जन्म लेने पर भी प्राणिहत्या का शेष कर्मफल चुकाना होगा। उदाहरण के लिए, स्त्रियों को स्त्रीरोग होंगे और पुरुषों को भी प्रजनन तंत्र से संबंधित रोग होंगे।