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《阴律无情》

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तीसरी स्थिति आज मानव लोक में सबसे अधिक है। बहुत-से अविवाहित स्त्री-पुरुष गर्भ ठहरते ही गर्भपात करवा लेते हैं। इस कर्म का फल सबसे भारी है। जीवनकाल में पुण्यफल घटता है और आयु समाप्त होने पर पहले कोड़ों और डंडों के नरक में 800 वर्ष तक, फिर तलवारों के वन के नरक में 2000 वर्ष तक कर्मफल भोगना पड़ता है। गर्भपात करवाने वाली स्त्री का अपराध पुरुष से अधिक भारी होगा, क्योंकि गर्भपात करवाने का अंतिम निर्णय स्त्री ही करती है। इसलिए उसका अपराध कुछ अधिक भारी होता है। इसके विपरीत, यदि पुरुष स्त्री से गर्भपात करवाने को कहे, लेकिन अंत में स्त्री भ्रूण को बचाकर बच्चे को जन्म दे, तो पुरुष के खाते में एक दुष्कर्म दर्ज होगा और स्त्री के खाते में एक सत्कर्म का गुप्त पुण्य दर्ज होगा। यदि पुरुष बाद में पश्चात्ताप करे, बच्चे की अच्छी देखभाल करे और मानव लोक के लोगों को गर्भपात न करवाने के लिए भरसक समझाए, तो दूसरों को गर्भपात के लिए उकसाने का यह दुष्कर्म माफ़ किया जा सकता है। आ यू, क्या तुम वहाँ जाकर देखना चाहती हो?”

मैंने कहा: “हाँ, अवश्य!” हम बहुत जल्दी वहाँ पहुँच गए। यह स्थान यौन दुराचार के नरक से अलग था। यौन दुराचार का नरक कामुक विचारों और पीड़ा की आवाज़ों से भरा रहता है, जबकि यहाँ अत्यंत गहरे द्वेष और पीड़ा से भरी चीखें तथा रोने की आवाज़ें थीं। ऊपर देखा तो चार बड़े चीनी अक्षरों में लिखा था: “枉死哭城”, अर्थात “अन्यायपूर्ण मृत्यु का रुदन नगर”।

अरे! कितने सारे नन्हे-नन्हे लोग हैं! वे इतने घने हैं कि जगह खाली ही नहीं दिखती, और सब रो रहे हैं। उनका रुदन इतना करुण था कि उन्हें देखकर मेरे भी आँसू बहने लगे। कुछ शिशु ज़ोर-ज़ोर से चीख रहे थे और कुछ रक्त के गोले जैसे दिख रहे थे।

न्यायाधिकारी ने कहा कि गर्भपात के समय डॉक्टर ने उन्हें ऐसा बना दिया था। एक शिशु आत्मा अत्यधिक भयभीत हो गई थी और अब तक वहाँ सिकुड़कर एक गोले की तरह पड़ी थी। वास्तव में अब वह अपना शरीर फैला सकती थी, लेकिन अब भी उस पीड़ा से चिपके रहने की अवस्था से बाहर नहीं निकल पा रही थी। मैंने न्यायाधिकारी से पूछा कि उसे कब इस तरह कष्ट सहना नहीं पड़ेगा। न्यायाधिकारी ने कहा कि यह इस पर निर्भर करेगा कि उस शिशु आत्मा के माता-पिता उससे क्षमा माँगते हैं या उसके लिए पुण्यकर्म करके पुण्य समर्पित करते हैं या नहीं। एक और बच्ची की आत्मा अपनी माँ को पुकार रही थी। मैंने न्यायाधिकारी से पूछा कि जिस शिशु आत्मा का अभी जन्म ही नहीं हुआ, वह ‘माँ’ कैसे पुकार सकती है। न्यायाधिकारी ने कहा कि यदि ये शिशु मानव लोक में मनुष्य बनकर जन्म लेते, तो उन्हें एक वर्ष की आयु के बाद बोलना सीखना शुरू करना होता। लेकिन अब वे मानव लोक में नहीं हैं। नरक में आने पर वे आध्यात्मिक सत्ता के रूप में हैं। आध्यात्मिक सत्ताओं में अभिज्ञा (अलौकिक क्षमता) होती है और वे मानसिक संकल्प तथा विचार के माध्यम से काम करती हैं। कुल मिलाकर, यहाँ की शिशु आत्माओं की दशा सचमुच बहुत दयनीय है। वे सभी निरंतर रोती-चीखती रहती हैं। आह! स्वर्गीय व्यवस्था का गुण जीवन का पोषण करना है। हमें अपने स्वार्थ के लिए निर्दोष नन्हे जीवनों की निर्दयता से हत्या कभी नहीं करनी चाहिए।

न्यायाधिकारी ने मुझे बताया कि यह “अन्यायपूर्ण मृत्यु का रुदन नगर” नया बनाया गया है। हमारे बात करते समय भी शिशु आत्माएँ लगातार यहाँ प्रवेश कर रही थीं। सचमुच कितनी अधिक थीं!

तभी मैंने शिशुओं का एक बड़ा समूह देखा, जो हाथों में पीला कागज़ लिए उड़कर बाहर आ रहा था। मैं हैरान हो ही रही थी कि न्यायाधिकारी ने कहा कि वे परलोक के अधिपति यमराज से स्वीकृत आदेश-पत्र लिए हुए हैं। इस आदेश-पत्र के होने पर परलोक के प्रहरी उन्हें यहाँ से बाहर जाने देते हैं और वे अपने माता-पिता को खोजने जा सकते हैं। अधिकतर वे अपनी माँ के शरीर से चिपककर उसे अस्वस्थ कर देते हैं। वे शरीर के किस स्थान पर चिपकेंगे, यह शिशु आत्मा की पसंद पर निर्भर करता है। कुछ शिशु आत्माएँ माँ के पेट में लौटना पसंद करती हैं और गर्भाशय के भीतर चिपक जाती हैं। कुछ माँ की छाती से चिपकना पसंद करती हैं, इत्यादि। कुछ लगातार माँ या पिता के पीछे लगी रहती हैं और कुछ माता-पिता को सोने नहीं देतीं। कुल मिलाकर, वे किसी भी समय परेशानी खड़ी करती रहती हैं। यदि दूसरे बच्चे जन्म लें, तो ये शिशु आत्माएँ परिवार की शांति बिगाड़ती हैं। उदाहरण के लिए, वे छोटे भाइयों और बहनों को मारती हैं और जानबूझकर अनेक घटनाएँ पैदा करती हैं, ताकि माता-पिता के प्रति अपना आक्रोश व्यक्त कर सकें।

यहाँ दाईं ओर एक पुराना नगर है, जो 70 वर्ष पहले का है। उसे “रक्त-मलिन नगर” कहते हैं। अब “रक्त-मलिन नगर” में जगह पर्याप्त नहीं रह गई है। उसके भीतर की शिशु आत्माओं में अकेलेपन का भाव अधिक प्रबल लगता है। न्यायाधिकारी ने कहा कि जिन शिशु आत्माओं का गर्भपात जानबूझकर नहीं किया गया था, उन सभी को यहाँ रखा जाता है। ओह! तो यह बात है। इसीलिए वे सभी अकेले-अकेले रो रही थीं।

न्यायाधिकारी ने यह भी कहा कि 70 वर्ष पहले बहुत कम लोग जानबूझकर गर्भपात करवाते थे। उस समय अधिकतर ऐसी शिशु आत्माएँ थीं जो पर्याप्त पुण्यफल न होने के कारण जन्म नहीं ले सकी थीं। लेकिन आज मानव लोक में अधिकतर गर्भपात जानबूझकर किए जाते हैं। मानव लोक की संभोग के बाद ली जाने वाली गर्भनिरोधक गोली लेना भी प्राणिहत्या का अपराध है। शिशु आत्माएँ पहले ही गर्भ में आ चुकी होती हैं, और ऐसी गोलियाँ लेने से सफलतापूर्वक गर्भपात किए गए शिशुओं की संख्या भी असंख्य है।17

न्यायाधिकारी ने फिर कहा: “आजकल मानव लोक से गर्भपात में मारे गए शिशुओं की आत्माएँ हर दिन यहाँ हाज़िर होने आती हैं। उनमें से नब्बे प्रतिशत का गर्भपात यौन दुराचार के कारण हुआ होता है। यह प्राणिहत्या का एक महान दुष्कर्म है। यौन दुराचार में प्राणिहत्या जुड़ने से सामूहिक दुष्कर्म की एक विपत्ति बनेगी। जब इस कर्म की शक्ति स्वर्ग और पृथ्वी का संतुलन बिगाड़ने की सीमा तक पहुँच जाएगी, तब मानव लोक में निश्चित ही आपदा आएगी। यह इन्हीं द्वेषपूर्ण भावों के कारण होगा। उन्हें अपना आक्रोश निकालना है और इस भारी दुष्कर्म के एक हिस्से को आपदा के माध्यम से क्षीण करना है। आ यू! जल्दी लौटो और मानव लोक के सत्त्वों को गर्भपात के इस कर्मफल के बारे में सचेत करो!”

जी! न्यायाधिकारी, आज आपने बहुत परिश्रम किया!

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