0/लेखिका की भूमिका
अमिताभ बुद्ध! आप सभी को नमस्कार!
कामना है कि संसार में शांति हो और युद्ध के अस्त्र शांत हो जाएँ!
कामना है कि समस्त आकाश और धर्मधातु के सभी चेतन प्राणी आनंदित, सुखी, शांत और निश्चिंत हों!
कामना है कि धर्मधातु के सभी चेतन प्राणी जन्म-मृत्यु से मुक्त हों, तीनों लोकों से बाहर निकलें, दुःख से छुटकारा पाएँ और सुख प्राप्त करें!
कामना है कि धर्मधातु के सभी चेतन प्राणी सद्धर्म सुनें और शुद्ध शील-व्रतों का पालन करके सिद्धि प्राप्त करें; उनका शील उज्ज्वल मणि की तरह निर्मल और निष्कलंक हो!
कामना है कि हमारी धरती माँ का चुंबकीय क्षेत्र शीघ्र ही कल्प के आरंभ वाला संतुलन और सामंजस्य फिर पा ले। कामना है कि जिन चेतन प्राणियों को अपने कर्मगत संबंध के कारण यह लेख देखने का अवसर मिले, वे अपने आसपास के संबंधियों और मित्रों को इसकी बात आगे पहुँचाएँ। वे पूर्वकाल में पंचशील का पालन करके पाए गए बहुमूल्य मनुष्य-शरीर को सँजोएँ, अच्छी तरह साधना करें और अवसरों तथा अनुकूल स्थितियों से संपन्न इस मनुष्य-शरीर का उपयोग करते हुए शुद्ध शील-व्रतों का पालन जारी रखें, अपने भीतर के स्वभाव की ज्योति बढ़ाएँ और शीघ्र ही मुक्ति के पार पहुँचें!
आइए, अपनी आध्यात्मिक चेतना को प्रकाश की ओर बढ़ाएँ। यदि सभी चेतन प्राणियों की आध्यात्मिक चेतना प्रकाशमान हो, तो इससे ब्रह्मांड और प्रकृति में सहज संतुलन आएगा, और हमें सामूहिक कर्म से उत्पन्न इतनी अधिक बड़ी प्राकृतिक आपदाएँ भी नहीं झेलनी पड़ेंगी। इसलिए कहा जा सकता है कि समस्त विशाल ब्रह्मांड के लिए पहले स्वयं को सँवारना आवश्यक है। हममें से हर एक स्वयं एक लघु ब्रह्मांड है; लघु ब्रह्मांड विशाल ब्रह्मांड से जुड़ा है। एक ही सब है और सब ही एक है। हमारे बीच अपना-पराया नहीं है; सब कुछ एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़ा है। यह मत समझिए कि कोई अत्यंत निजी काम करने पर किसी को पता नहीं चलता। भलाई या बुराई का एक विचार भी सीधे परलोक के शासन की सत्कर्म-दुष्कर्म लेखा-पुस्तिका से जुड़ जाता है।1
बुद्ध और बोधिसत्त्व करुणापूर्वक देख रहे हैं कि आज संसार के आचरण का पतन हो रहा है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी की उन्नति ने लोगों को भरपूर भौतिक वस्तुएँ दी हैं, और लोगों के मन तथा विचार तेजी से बिगड़ने लगे हैं। आज अधिकांश लोग कर्म और फल में विश्वास नहीं करते; वे इसे पुराने जमाने की सोच मानते हैं जो समय के अनुरूप नहीं है। छोटे बच्चों में भी अब वैसी सहज निर्मलता और भलमनसाहत नहीं रही जैसी पहले कल्प के आरंभ में थी, तो वयस्कों की बात ही क्या! वे नहीं जानते कि इसका कारण प्राचीन काल की कन्फ्यूशियस और मेंगज़ी की उत्तम परंपरा तथा चार पुस्तकों और पाँच शास्त्रों की शिक्षा का खो जाना है।
आज लोगों का मानसिक जीवन उन्मुक्त हो गया है। उदाहरण के लिए, बड़े शॉपिंग मॉल में बिकने वाले बिना आस्तीन के और पतली पट्टियों वाले कपड़ों को आज सामान्य माना जाता है, जबकि पुराने समय में स्त्रियों का इस तरह कपड़े पहनना बिल्कुल असंभव था। अब वयस्क सामग्री की दुकानें हर जगह दिखाई देती हैं। बड़े अखबार स्टॉलों पर अखबारों की सामग्री और पत्रिकाओं के मुखपृष्ठ लगभग सभी बिकिनी और गहरे गले वाले परिधानों से भरे होते हैं। छोटे बच्चे इन्हें हर दिन अवश्य देखते हैं; वे बिगड़ना न भी चाहें, तो बचना बहुत कठिन है। बुद्ध और बोधिसत्त्व ने देखा है कि संसार में आध्यात्मिक शिक्षा का गंभीर अभाव हो गया है। उन्हें जीवों की आध्यात्मिक चेतना के पतन की चिंता है; विपत्तियाँ निश्चित ही लगातार एक के बाद एक आती रहेंगी। यद्यपि संसार में कुछ सदाशयी लोग संसार के आचरण को सँभालने वाले संदेश और लेख लगातार प्रसारित करते रहते हैं, लेकिन यदि जीव बुराई छोड़कर भलाई नहीं अपनाते, तो आयु समाप्त होने पर उन्हें अवश्य नरक में गिरकर तरह-तरह के कठोर दंड भोगने होंगे, और वहाँ से निकलने का कोई दिन नहीं होगा।