अब ‘यूवांग मंच’ लिखे तीन बड़े चीनी अक्षर दिखाई दे रहे हैं। यूवांग मंच का परिसर भी बहुत बड़ा है! यह कुछ-कुछ मनुष्यलोक की जड़ी-बूटियों की शीतल चाय की किसी अत्यंत विशाल दुकान जैसा लगता है। यहाँ तीन अलग-अलग रंगों के बड़े पात्र हैं। न्यायाधिकारी ने बताया कि पारदर्शी पात्र में अधिक मीठा सूप है, अर्थात् यह सबसे बड़े पुण्यफल वालों के लिए है। सफ़ेद पात्र का सूप सामान्य पुण्यफल वाले प्राणियों के लिए और काले पात्र का सूप सबसे कम पुण्यफल वाले प्राणियों के लिए है। मेंग पो का सूप बाँटने वाले तीन प्रकार के प्रेत-प्रहरियों के वस्त्रों के रंग भी इन्हीं के अनुरूप हैं। पारदर्शी पात्र से सूप बाँटने वाले प्रेत-प्रहरी पारदर्शी वस्त्र पहने हैं, सफ़ेद पात्र से बाँटने वाले सफ़ेद वस्त्र पहने हैं और काले पात्र से बाँटने वाले काले वस्त्र पहने हैं।
बहुत-से प्रेत-प्रहरी मेंग पो का सूप प्यालों में डालने में व्यस्त हैं। प्याले गोल हैं और नीचे एक डंडी है, जिस पर प्याले का ऊपरी हिस्सा टिका है। देखने में सबका रंग, आकार और बनावट एक जैसी है। लेकिन और ध्यान से देखने पर पता चलता है कि वे एक जैसे लगते हुए भी थोड़े-से अलग हैं। सभी प्याले पारदर्शी और एक ही आकार के हैं, लेकिन उनकी डंडियों पर उभरे अलंकरण अलग-अलग हैं। एक प्रकार के पारदर्शी प्याले की डंडी चिकनी है और उस पर कोई अलंकरण नहीं है। जब आत्मिक देह वाला प्राणी उसे उठाकर मेंग पो का सूप पीता है, तो हाथ में आरामदायक महसूस होता है। दूसरे प्रकार के पारदर्शी प्याले की डंडी पर थोड़ा-सा उभरा अलंकरण है, जिसे हाथ में लेने पर उसकी बनावट महसूस होती है। अंतिम प्रकार के पारदर्शी प्याले की डंडी पर त्रिकोणाकार उभरा अलंकरण है। जब आत्मिक देह वाला प्राणी उसे उठाकर मेंग पो का सूप पीता है, तो वह हाथ में कुछ चुभता है और असुविधा महसूस होती है।
यूवांग मंच के भीतर बहुत-से छोटे कमरे हैं, जो दाएँ और बाएँ, दो ओर बने हैं। बाईं ओर के कमरे बड़े पुण्यफल वाले प्राणियों के लिए हैं, जो अधिक मीठा मेंग पो का सूप पीते हैं। पहले बाईं ओर के छोटे कमरे देखती हूँ। हर कमरे में एक मेज़ और बैठने के आसन हैं। मेज़ पर अधिक मीठे मेंग पो के सूप का एक प्याला रखा है और दो सेविकाएँ उसे आत्मिक देह वाले प्राणी को पीने के लिए पेश करती हैं। अर्थात् अच्छे पुण्यफल वाले प्राणी कमरे में बैठकर पी सकते हैं। यह कुछ-कुछ मनुष्यलोक के विशिष्ट अतिथि कक्ष जैसा है, जहाँ विशेष सेवा मिलती है। अब दाईं ओर के छोटे कमरे देखती हूँ। हर कमरे में भी एक मेज़ और बैठने के आसन हैं। मेज़ पर पाँचों स्वादों से युक्त मेंग पो के सूप का एक प्याला रखा है, लेकिन उसे आत्मिक देह वाले प्राणी को पेश करने के लिए केवल एक सेविका है। अर्थात् सामान्य पुण्यफल वाले प्राणी भी कमरे में बैठकर पी सकते हैं।
आगे चलने पर मेंग पो का मंडप है। तो मेंग पो देवी मेंग पो मंडप में हैं।
“मैं, आ यू, मेंग पो देवी को हाथ जोड़कर प्रणाम करती हूँ!”
मेंग पो देवी मेरी ओर मुस्कराईं। न्यायाधिकारी ने कहा कि मेंग पो देवी सामान्यतः मेंग पो मंडप में ही रहती हैं। सबसे अधिक घटनाएँ इसी मंडप में होती हैं। यहाँ कभी-कभी ऐसे आत्मिक प्राणी आते हैं, जो मेंग पो का सूप पीने को तैयार नहीं होते। मेंग पो मंडप में सूप पीने आने वाले सभी प्राणियों के पुण्यफल अपेक्षाकृत कम होते हैं, अर्थात् उनके कर्मावरण अधिक भारी होते हैं। इसी के अनुसार यहाँ प्रेत-प्रहरी भी बहुत अधिक हैं और सभी के हाथों में नुकीले काँटे हैं।
मैंने देखा कि बहुत-से आत्मिक प्राणी कतार लगाकर मेंग पो मंडप में आ रहे हैं। सभी बहुत थके हुए और बेहद प्यासे लगते हैं। कुछ के शरीर में तो बिल्कुल शक्ति नहीं बची है। जो चल सकते हैं, वे स्वयं चलते हैं और अपनी बारी आने पर स्वयं प्याला उठाकर पीते हैं। जिनके शरीर में शक्ति नहीं है, उन्हें प्रेत-प्रहरी सहारा देकर मेंग पो मंडप तक लाते हैं और सूप पिलाते हैं।
तभी एक तीखी चीख सुनाई दी। एक स्त्री की आत्मा सूप पीने से मना कर रही थी और दो प्रेत-प्रहरियों ने उसे पीटा था। हाय! उस स्त्री की आत्मा की दशा कितनी दयनीय थी! एक प्रेत-प्रहरी ने उसके पाँव पर काँटे से प्रहार किया, जिससे वह ज़मीन पर गिर गई और उसके पाँव से रक्त बहने लगा। यह देखकर दूसरे प्रेत-प्रहरी ने तुरंत अपना काँटा उसमें घोंपकर उसे उठा लिया और ज़बरदस्ती तीन प्याले सूप पिला दिया। न्यायाधिकारी ने कहा कि इस स्त्री की आत्मा को आगे मनुष्यलोक में पाँव का दर्द और गले की समस्याएँ होंगी। तो मेंग पो का सूप पीने से मना करने वाले आत्मिक प्राणियों को प्रेत-प्रहरियों से मार ही नहीं खानी पड़ती, बल्कि उसके बाद दंडस्वरूप दो अतिरिक्त प्याले कड़वा मेंग पो का सूप भी पीना पड़ता है। इसके परिणामस्वरूप उन्हें आगे और अधिक शारीरिक कष्ट सहने पड़ते हैं। मेंग पो का सूप पीने के बाद सभी आत्मिक प्राणी चेतना धुँधली पड़ने की अवस्था में होते हैं और प्रेत-प्रहरी उन्हें सहारा देकर पुनर्जन्म के लिए ले जाते हैं।
मैंने देखा कि मेंग पो मंडप के सामने एक बड़ी नदी है। आत्मिक प्राणी नदी में गिरते ही मनुष्यलोक में फिर जन्म लेने चले जाते हैं।
परलोक के न्यायाधिकारी ने कहा, “आज का समय पूरा हो गया है। आ यू, अगली बार फिर आइए!”