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《阴律无情》

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आज मैं परलोक के न्यायाधिकारी से पूछना चाहती हूँ कि दूसरों का गर्भपात करने वाले चिकित्सकों को क्या कर्मफल मिलता है?

परलोक के न्यायाधिकारी ने कहा: “70 वर्ष पहले गर्भपात करने वाले चिकित्सकों को केवल चीख-पुकार के नरक में 1,000 वर्ष, तलवार-पत्र नरक में 1,000 वर्ष, हृदय-विदारण नरक में 1,000 वर्ष, हिमशीत नरक में 1,000 वर्ष और नेत्र-बेधन नरक में 1,000 वर्ष बिताने पड़ते थे। जब तक उनके द्वारा पीड़ित सभी शिशु-आत्माएँ सफलतापूर्वक मनुष्य लोक में जन्म नहीं ले लेतीं, तब तक वे नरक के कष्ट से मुक्त नहीं हो सकते थे। उनकी आत्मिक चेतना कितनी सँभली है, यह देखकर फिर तय किया जाता था कि वे कब मनुष्य लोक में पुनर्जन्म लेंगे। मनुष्य लोक में पुनर्जन्म लेने पर वे अल्पायु और अनेक रोगों से ग्रस्त होते थे। आम तौर पर कंधों, गर्दन, हाथ-पैर आदि अंगों का सुन्न पड़ना, अत्यधिक घबराहट, सिरदर्द, कमर और पीठ में दर्द, मिर्गी, पुराना नासाशोथ, विभिन्न स्त्रीरोग, पति-पत्नी के बीच संभोग न हो पाना, स्तन कैंसर, गर्भाशय कैंसर, रात में बार-बार पेशाब आना आदि होता था। एक बार में सभी रोग-लक्षणों को पूरी तरह बताना संभव नहीं। कुल मिलाकर, गर्भपात करने वाले चिकित्सक ने उस समय शिशु-आत्माओं को जैसे-जैसे कष्ट सहाए थे, मनुष्य लोक में मानव के रूप में पुनर्जन्म लेने पर उसे भी बीमारी के रूप में वे कष्ट अवश्य सहने पड़ते थे। मनुष्य लोक की दवाएँ उन्हें ठीक नहीं कर सकतीं। जब तक उस कर्म की शक्ति समाप्त न हो, रोग ठीक नहीं होता; उसके समाप्त होने पर रोग ठीक हो जाता है। यह 70 वर्ष पहले दूसरों का गर्भपात करने वाले चिकित्सकों का कर्मफल था।23

आज जीवितों के लोक में गर्भपात करने वाले चिकित्सकों का कर्मफल यह है कि जीते-जी ही उनके सौभाग्य और आयु में हर स्तर पर कटौती हो चुकी होती है। पारिवारिक भाग्य, कार्यक्षेत्र का भाग्य और धन का भाग्य, सब घट जाते हैं। सबसे पहले सिरदर्द, कमर और पीठ में दर्द, कंधों तथा हाथों में दर्द दिखाई देते हैं। आयु समाप्त होने के बाद उन्हें पहले विखंडन नरक में 1,00,000 वर्ष कर्मफल भोगना पड़ता है। उसके बाद उन्हें अभी बताए गए प्रत्येक नरक में दंड भोगने के लिए भेजा जाता है। आज दूसरों का गर्भपात करने वाले चिकित्सक प्रतिदिन बड़ी संख्या में प्राणिहत्या करते हैं और इससे बहुत-से जीवन जुड़े होते हैं। साथ ही, आज उपयोग किए जाने वाले गर्भपात के उपकरणों से शिशु-आत्माओं को पहुँचने वाली क्षति और उसके बाद के दुष्प्रभाव भी पहले से अधिक हैं। इसलिए आज गर्भपात करने वाले चिकित्सकों द्वारा बोए गए दुष्कर्म भी अधिक भारी हैं।

वास्तव में, इन भावी माता-पिता के गर्भपात करवाने के बाद शिशु-आत्माओं में द्वेष उत्पन्न होता है, जिससे आत्माओं के कारण बाधाएँ आने के मामले भी बहुत होते हैं। पहले तुमने हाथों में पीले आदेश-पत्रक लिए जिन शिशु-आत्माओं को देखा था, वे सब अपने भावी माता-पिता से बदला लेने बाहर जा रही थीं। इसी को आत्माओं से उत्पन्न बाधा कहते हैं। उनसे आने वाली विपत्तियाँ अनेक प्रकार की होती हैं। हल्के मामलों में वे शरीर पर अधिकार कर लेती हैं, जिससे व्यक्ति लंबे समय तक बीमार रहता है और दवाएँ लेता रहता है; गंभीर मामलों में जान का खतरा तक हो सकता है। इसके अलावा, बहुत-से बच्चे वास्तव में अपने ही पूर्वजों के पुनर्जन्म होते हैं।

आ यू, अब तुम ‘विखंडन नरक’ जाकर देखो! लौटकर विस्तार से लिखना, ताकि संसार के लोग सावधान हों!”

अच्छा! परलोक के न्यायाधिकारी के प्रति आभार! मैं तुरंत ‘विखंडन नरक’ पहुँचती हूँ।

मैंने देखा कि प्रत्येक नरक की एक विशेषता है: भीतर प्रवेश करने से पहले ही पीड़ा से उठती, कानों को बहरा कर देने वाली चीखें और कराहें सुनाई देने लगती हैं। यह नरक की कभी न बदलने वाली विशेषता है। इसलिए यह कहना बिल्कुल सही है कि सबसे अधिक कष्ट नरक में हैं। भूलकर भी नरक मत आना। तभी मैंने कुछ स्त्री-आत्माओं को देखा। बहुत-से यक्ष उन्हें छोटे, गोल, लाल रंग के लोहे के छिद्रों में हाँक रहे थे, जिनमें तीखी सड़ांध भरी थी। प्रत्येक के लिए एक अलग लोहे का छिद्र था। वे छिद्र इतने छोटे थे कि इस तरह ज़बरदस्ती ठूँसने पर भी स्त्री-आत्माओं के शरीर उनमें घुस ही नहीं सकते थे! स्त्री-आत्माएँ मुड़कर भागीं, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। यक्ष बहुत क्रूर थे! वे क्रोध में ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते हुए हाथों के नुकीले काँटेदार शस्त्रों से स्त्री-आत्माओं को बींधकर उठाते और लोहे के छिद्रों में ज़बरदस्ती ठूँस देते। स्त्री-आत्माओं का पूरा शरीर खून से भर गया, हाथ-पैर टूट गए, और अंततः वे पूरी की पूरी भीतर चली गईं। फिर यक्षों ने लोहे के छिद्रों की ओर पंखा झला। स्त्री-आत्माएँ ऐसी हो गईं मानो कुछ हुआ ही न हो; उनका पूरा शरीर फिर पहले जैसा हो गया। तभी यक्षों ने फिर नुकीले चाकू जैसे हुक निकाले और स्त्री-आत्माओं को उनमें फँसाकर बाहर खींचने लगे। स्त्री-आत्माएँ दर्द से चीख रही थीं; उनका बाहर निकलना संभव ही नहीं था। तब यक्षों ने कैंचियाँ लीं और स्त्री-आत्माओं को टुकड़े-टुकड़े काटकर निकाला। ज़मीन खून से भर गई। शरीर का प्रत्येक भाग बाहर निकल आने पर यक्षों ने चूषण-पात्रों से उन सभी भागों को खींचकर एक साथ जोड़ दिया और वे फिर जीवित हो गईं। यही चक्र फिर दोहराया गया और ऐसा पीड़ादायक दंड लगातार चलता रहा। आह! यह सचमुच अत्यंत भयानक था। मैं आगे और नहीं देखना चाहती थी। यह असहनीय पीड़ा थी! अमिताभ बुद्ध! भूलकर भी दूसरों को हानि पहुँचाने वाले काम मत करना। यह बच्चे को जन्म देने की पीड़ा से न जाने कितने सैकड़ों-हज़ारों गुना अधिक कष्टदायक है!

परलोक के न्यायाधिकारी, आपने कष्ट उठाया। मैं, आ यू, आपको हाथ जोड़कर प्रणाम करती हूँ! श्वेत कमल पर सवार होकर लौटती हूँ।

23/बच्चे, कृपया मत रोओ—परलोक के न्यायाधिकारी गर्भपात के परिहार के उपाय विस्तार से समझाते हैं

बुद्ध की शक्ति के अनुग्रह के लिए कृतज्ञ हूँ! श्वेत कमल पर सवार होकर प्रस्थान करती हूँ!

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