अब परलोक के अधिपति यमराज को प्रतिदिन सुबह, दोपहर और शाम, हर बार पंद्रह मिनट, गले में गर्म रेत भरने की पीड़ा सहनी पड़ती है। रोज़ दंड का समय आते ही उन्हें दंड देने वाले दो यक्ष मिलकर पकड़ लेते हैं। एक सिर पकड़ता है, दूसरा गर्म लोहे की रेत निकालकर लगातार उनके गले में भरता है। इससे वे अचेत होकर गिर जाते हैं, फिर कर्म-वायु से जगाए जाते हैं। होश आते ही दोनों यक्ष फिर पकड़कर गर्म लोहे की रेत भरते हैं। इस प्रकार पंद्रह मिनट दंड का चक्र चलता है। पंद्रह मिनट बीतने पर अधिपति यमराज अपने-आप सचेत हो जाते हैं और सब सामान्य हो जाता है।
अधिपति यमराज का गर्म लोहे की रेत गले में भरने का दुख पिछले समय में प्रतिशोध का प्रण करने का फल है। मनुष्यलोक में प्रतिदिन लोग छोटे-बड़े अशुभ प्रण करते हैं। कोई अशुभ प्रण करता है तो उसकी देह-आभा तुरंत मंद हो जाती है और उस प्रण का नकारात्मक चुंबकीय क्षेत्र उसे जन्म-जन्मांतर कसकर बाँधे रखता है।121
जन्मजात देह-आभा को क्षति पहुँच जाए तो जीवन में बाधाएँ बढ़ती हैं और कठिनाई बहुत अधिक होती है, जब तक समय रहते सच्चे पश्चात्ताप से शुद्धि न की जाए और फिर कभी ऐसा न किया जाए। अशुभ प्रण का फल पकने से पहले यदि व्यक्ति के शुभ कर्म अशुभ कर्मों से हल्के हों और उसे सदा ऐसा कल्याणमित्र न मिले जो पश्चात्ताप का मार्ग दिखाए, तो उसका जीवन उस प्रण के नकारात्मक चुंबकीय क्षेत्र में बँधा रहेगा। अशुभ फल पकने पर असीम पीड़ा होगी।
आशा है आ यू यह लेख शीघ्र लिखकर सबको बताएँगी कि किसी भी समय अशुभ प्रण न करें। पहले किए हों तो शीघ्र पश्चात्ताप करें। शुभ प्रण असीम किए जा सकते हैं; उन्हें कर्म में उतारें और पूरा करने का भरसक प्रयास करें।
अभी मनुष्यलोक में शीलभंग करने वाले बहुत हैं और शीलधारी बहुत कम। समग्र विशाल चुंबकीय क्षेत्र अच्छा नहीं है; लोगों के विचार आसानी से गलत दिशा में झुकने का यह भी एक बड़ा कारण है।
किसी चेतन प्राणी के काले कर्म इतने भारी हों कि अभी शील पालन के विभिन्न कारण-प्रत्यय पूरे न हों, तो चिंता या निराशा न करें। कर्म भारी न हों तो सहा लोक में जन्म ही न हो। पहले पुराने काले कर्मों का पश्चात्ताप करने का संकल्प करें, फिर प्रण करें कि जन्म-जन्मांतर शील पालन का दृढ़ मन मिले। साथ में बुद्ध-नाम स्मरण, शाकाहार और विविध शुभ कर्म करें। इससे भविष्य के जीवन का स्तर निश्चित रूप से धीरे-धीरे ऊँचा होगा। यही विधि अकुशल कर्मों को वास्तव में पूर्णतः दूर कर सकती है, सदा के लिए दुख से छुड़ा सकती है और भविष्य को क्रमशः प्रकाश की ओर ले जा सकती है।
जिन चेतन प्राणियों को यह लेख देखने का अवसर मिलता है, उन्होंने पहले कुछ पुण्यफल संचित किया है। जो इसे पुनः प्रकाशित करके दूसरों को बताए, परलोक उसके दो शुभ कर्म दर्ज करेगा। जो केवल स्वयं सुधरे, उसका भी एक शुभ कर्म दर्ज होगा।
अच्छा! आज रात मैंने अशुभ प्रणों से संबंधित सिद्धांत स्पष्ट कर दिए। समय देर का है और मनुष्यलोक में शीघ्र भोर होगी। आ यू, जल्दी लौटकर यह लेख लिखिए। आगे आवश्यकता हो तो कभी भी आइए।”
आ यू: “अच्छा! नगर-रक्षक देव को साष्टांग प्रणाम! नगर-रक्षक देव का आभार! न्यायाधिकारी को साष्टांग प्रणाम! न्यायाधिकारी का आभार! मैं अब लौटती हूँ। नमो अमिताभ बुद्ध!”
श्वेत कमल पर सवार होकर घर लौटती हूँ!