परलोक के न्यायाधिकारी ने कहा, “यहाँ की पापी आत्माओं के लिए प्रवेश तो है, निकास नहीं। इस नरक में आने वाली सभी आत्माओं के पापों का घड़ा भर चुका होता है। भीतर ज़मीन के नीचे लावे का तापमान एक हज़ार डिग्री से अधिक है। इसे हमारे नरकों की सबसे कठोर यातना कहा जा सकता है!”
ओह! एक हज़ार डिग्री? कितना डरावना है! ‘परलोक के अटल विधान’ लिखने के लिए हिम्मत जुटाकर देखना ही होगा! बुद्ध-बल के अधिष्ठान से मैं अवीचि नरक की एक छोटी-सी लोहे की खिड़की से भीतर देख सकी। यह नरक बहुत बड़ा नहीं था। बाहर से इसका आकार कुछ-कुछ मनुष्य की नाक जैसा था और भीतर एक काला गड्ढा था। यह काला गड्ढा ज़मीन के नीचे के लावे तक जाता था। लावे से धुआँ उठ रहा था और वह अत्यंत दहकता दिखाई देता था। पापी आत्माओं को इस धुआँ उठते लावे में पूरी तरह उबालने के बाद ऊपर उछाल दिया जाता था। ऊपर उछालने का अर्थ किसी दूसरी जगह फेंकना नहीं था, बल्कि लावे के ऊपर उठते तपते धुएँ में उछालकर झुलसाना था। उनके आत्मिक शरीर अभी बहाल भी नहीं हुए होते और वे अब भी घोर पीड़ा से कराह और चीख रहे होते कि खौलता लावा उन्हें फिर खींचकर यातना देने लगता। तब आत्मिक शरीर से फिर एक मर्मांतक चीख निकलती। अवीचि नरक में इसी तरह बिना किसी विराम के यातना का चक्र चलता रहता है। यह सचमुच अत्यंत भीषण था!
अभी तो यहाँ अँधेरा और गर्मी थी, अचानक इतनी अनुपम शीतलता कहाँ से आ गई? सिर उठाकर देखा तो आदरणीय क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व करुणापूर्वक पधार चुके थे। क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व को प्रणाम! आज क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व ने सौम्य करुणामय रूप प्रकट नहीं किया था, बल्कि खड़े हुए क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व का रौद्र रूप56 धारण किया था। उनके पीछे का प्रभामंडल एक बड़ा गोल सुनहरा प्रकाशवृत्त था। उनके चरण नीले-हरे कमल पर थे और उस नीले-हरे कमल के नीचे प्रचंड अग्नि जल रही थी। लेकिन इस अग्नि से घुटनभरी गर्मी का अनुभव नहीं होता था; उलटे, ऐसा लगता था मानो वह विकारपूर्ण विचारों को दूर कर रही हो। बोधिसत्त्व के बाएँ हाथ में जो मणि थी, वह अग्नि जैसी लाल थी, और दाएँ हाथ में पकड़े सुनहरे खक्खर दंड57 के शीर्ष पर आज एक लाल कमल भी था। आज क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व में मारों का दमन करने वाली विशेष दिव्य शक्ति दिखाई दे रही थी। उन्हें देखते ही मन में कोई भी विकारपूर्ण विचार लाने का साहस नहीं होता था। मन गंभीर श्रद्धा और भयमिश्रित आदर से भर जाता था। मैंने पहली बार क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व को इतना गंभीर देखा था। धर्माचार्य दाओमिंग और धर्मरक्षक मिन गोंग में कोई विशेष अंतर नहीं था। धर्माचार्य दाओमिंग ने गरिमामय भिक्षु का रूप धारण किया था और दोनों हाथों को आड़ा रखकर मार-दमन मुद्रा बनाई हुई थी। धर्मरक्षक मिन गोंग हाथ जोड़े बोधिसत्त्व के पास खड़े थे। लेकिन आज उनके वाहन दी तिंग का शरीर बड़ा हो गया था और वह भी रौद्र रूप में था।
अचानक परलोक का एक अधिकारी सूचना देने आया कि न्यायसभा में कोई मामला है, जिसे निपटाने के लिए न्यायाधिकारी को वहाँ जाना होगा। तब न्यायाधिकारी ने मुझे स्वयं घूमकर देखने को कहा और बताया कि कोई प्रश्न हो तो क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व से पूछ सकती हूँ। मैंने हाथ जोड़कर न्यायाधिकारी को प्रणाम किया और उनका आभार माना!
इस समय क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व ने मुझे उड़कर ऊपर आने का संकेत किया। थोड़ी देर में अवीचि नरक का द्वार खोला जाना था और उन्हें चिंता थी कि तपता लावा मुझे हानि पहुँचा सकता है। इसलिए क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व की दिव्य शक्ति के सहारे मैं भी ऊपर उठकर उनके नीचे की ओर आ गई और हवा में खड़ी हो गई। तभी धर्मरक्षक मिन गोंग नीचे उतरकर अवीचि नरक के एक के बाद एक लगे लोहे के द्वारों के सामने पहुँचे। दो परलोक प्रहरी द्वार खोलकर बाहर आए और तुरंत सावधानी से उसे फिर बंद कर दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें चिंता थी कि लावे की छींटें धर्मरक्षक मिन गोंग पर न पड़ जाएँ। धर्मरक्षक मिन गोंग ने कहा कि परलोक के अधिपति का आदेश है कि आ यू को उदाहरणों के रूप में जानकारी देने के लिए कुछ पापी आत्माओं को बाहर लाया जा सकता है। क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व ने तीन पापी आत्माओं को बाहर लाने को कहा था, जबकि सामान्यतः अवीचि नरक से एक भी पापी आत्मा को बाहर नहीं निकाला जा सकता। इसलिए प्रहरी फिर भीतर गए और तीन पापी आत्माओं को बाहर ले आए। उनमें दो पुरुष आत्माएँ और एक स्त्री आत्मा थी। वे इतनी पीड़ा में थीं कि खड़ी भी नहीं हो सकती थीं और एक भी शब्द नहीं बोल पा रही थीं। उनके पूरे शरीर पर कीचड़ लगा था और वे गल-सड़कर पहचान से परे हो गए थे। उनकी दशा अत्यंत दयनीय थी। उन्हें देखकर मेरा रोने का मन हुआ!
इसी समय धर्माचार्य दाओमिंग ने क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व के हाथ से लाल मणि लेकर मंत्र जपना शुरू किया। बोधिसत्त्व की मणि से तेज़ प्रकाश निकला, जिसने पूरे अवीचि नरक को प्रकाशित कर दिया। पूरा अवीचि नरक तुरंत अत्यंत शीतल और शांत हो गया। पीड़ा की आवाज़ें बंद हो गईं और लावा भी गर्म नहीं रहा। मेरा सारा तनाव मिट गया और उसकी जगह स्थिरता, अपनापन और सहजता का अनुभव होने लगा। ध्यान से सुना तो पता चला कि वह क्षितिगर्भ धारणी थी। मुझे यह मंत्र बहुत प्रिय है। धर्माचार्य के कुछ देर जप करने के बाद तीनों पापी आत्माओं की संवेदना धीरे-धीरे लौटने लगी और वे होश में आ गईं। पुरुष आत्माएँ अब ज़मीन पर घुटने टेक सकती थीं।
क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व ने कहा, “जीवित संसार की शांगगुआन युहुआ को परलोक द्वारा निर्धारित सदाचार की पुस्तक ‘परलोक के अटल विधान’ लिखनी है, जिससे संसार के लोगों को बुराई छोड़कर सही मार्ग पर आने की प्रेरणा मिले। अब तुम आ यू को बताओ कि अवीचि नरक में कैसे आए और जीवित रहते तुमने क्या किया था?” पुरुष आत्मा ने फूट-फूटकर रोते हुए कहा कि जीवित रहते वह विशेष रूप से यौन दुराचार के लिए कामोत्तेजक दवाएँ विकसित करता था। उसने स्वयं कुछ अश्लील पुस्तकें और हस्तमैथुन की सीडी भी बनाई थीं। जीवित रहते उसने बहुत धन कमाया था और पूरे जीवन में बस यही गलत काम किए थे। अब उसे अपनी गलती समझ में आ गई थी और वह बोधिसत्त्व से प्राण बचाने की गुहार लगा रहा था। क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व ने उसे उपदेश दिया, “यौन दुराचार की कामोत्तेजक दवाएँ तथा अश्लील पुस्तकें और सीडी मनुष्यों के सुंदर चित्त-स्वभाव को बिगाड़ती हैं। विशेष रूप से हस्तमैथुन की सीडी शुद्ध यांग देह वाले लड़कों58 के चित्त-स्वभाव को विचलित करती हैं। यदि उन्हें यह बुरी आदत लग जाए, तो वे शरीर को क्षति पहुँचाने, जीवन को हानि पहुँचाने और प्रज्ञा-जीवन को काट देने वाले नरक के मार्ग पर चल पड़ते हैं। परलोक के विधान में यह अक्षम्य है। जीवितों के संसार में तुम्हारे बनाए यौन दुराचार के सामान पूरी तरह समाप्त होने के बाद ही तुम नरक छोड़ सकते हो।” बोधिसत्त्व का उपदेश समाप्त होते ही उस पुरुष पापी आत्मा को तुरंत फिर भीतर धकेल दिया गया।
अब स्त्री आत्मा की बारी थी। उसने कहा, “जीवित रहते मैं सुंदर थी, उच्च शिक्षा प्राप्त थी और बात करने में निपुण थी, लेकिन मेरे भीतर लोभ और अहंकार बहुत प्रबल थे तथा ईर्ष्या भी बहुत थी। विवाहित होते हुए भी मैं अपने पति को तुच्छ समझती थी और अपने सास-ससुर की सेवा और सम्मान भी नहीं करती थी। मैं अक्सर उनसे अपशब्द कहती थी और मेरी बातें कटु तथा चुभने वाली होती थीं। मैंने अपने रूप का उपयोग करके गुप्त रूप से कई विवाहेतर संबंध बनाए। अपनी चतुर बातों से मैं उन पुरुषों को अपना सारा धन मुझे देने के लिए राज़ी कर लेती थी। फिर मैं उनके भीतर हीनता की भावना पैदा कर देती थी और उन्हें इतना क्षुब्ध करती थी कि वे मर जाते थे। मैं अपने को बहुत चतुर समझती थी और सोचती थी कि किसी को कुछ पता नहीं है। जिन तीन पुरुषों को मैंने क्षोभ से मार डाला था, उन्होंने मृत्यु के बाद यमराज के यहाँ शिकायत की। यमराज ने उन तीनों को मनुष्यलोक में ऊपर जाकर मेरी आत्मा पकड़ने और दंड भुगतने के लिए नरक में लाने का आदेश दिया। अवीचि नरक में आने से पहले मैं अन्य नरकों में तरह-तरह की यातनाएँ भुगत चुकी हूँ। बोधिसत्त्व, कृपया मुझे यहाँ से बाहर निकाल दीजिए। बाहर निकलने के बाद मैं अवश्य नए सिरे से सदाचारी जीवन जिऊँगी और फिर किसी को धोखा नहीं दूँगी।”
क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व ने कहा, “तुम्हारे नैन-नक्श सुडौल हैं क्योंकि पिछले जन्म में तुमने बुद्ध के सामने सच्ची श्रद्धा से फूल अर्पित किए थे। तुम्हारी वाक्पटुता और बुद्धि पिछले जन्म में सूत्रों का पाठ करने और धर्म सुनने का फल हैं। लेकिन अहंकार के कारण तुम्हारा जीवन सीधे पतन की ओर चला गया। तुम्हें पश्चात्ताप करना चाहिए और चार महान उपकारों59 की विशालता पर गहराई से चिंतन करना चाहिए। इसी अवीचि नरक में रहकर भली-भाँति पश्चात्ताप करो!” क्षितिगर्भ बोधिसत्त्व की बात समाप्त होते ही परलोक के प्रहरियों ने उस स्त्री आत्मा को काँटे से गोदकर भीतर फेंक दिया। केवल एक भीषण चीख सुनाई दी।
अब दूसरे पुरुष की आत्मा की बारी थी। उसने कहा कि जीवित रहते वह नकली औषधीय सामग्री बनाकर स्वयं बेचता था। वह नकली शराब भी बेचता था और गुप्त रूप से हथियारों की तस्करी करता था। बहुत धन कमाने के बाद उसकी कंपनी लगातार बड़ी होती गई। अपनी कंपनी की प्रसिद्धि बढ़ाने के लिए वह दूसरों की प्रतिष्ठा पर लांछन भी लगाता था। नरक में आने के बाद उसे अपनी गलती समझ में आ गई थी, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी!