दुःख के कारणों में से एक, यौन दुराचार, के विषय में महाचार्य यिनगुआंग ने कहा, “यह आकाशीय नैतिक व्यवस्था के विरुद्ध है और मानवीय संबंधों की मर्यादा को अस्त-व्यस्त करता है। ऐसा व्यक्ति जीवित रहते हुए वस्त्र पहना पशु है और मरने पर तीन दुर्गतियों में गिरता है, जहाँ से करोड़ों-अरबों कल्पों तक बाहर नहीं निकल सकता।”69 देश का भविष्य प्रतिभाशाली लोगों पर निर्भर है। प्रतिभाशाली लोगों में महत्त्वपूर्ण है उनकी गुणवत्ता, और गुणवत्ता के केंद्र में सदाचार तथा योग्यता हैं। यदि संसार के लोग अधिक यौन दुराचार करें, तो उनका सदाचार नष्ट होता है, योग्यता क्षीण होती है और विपत्तियों का अंत नहीं रहता। इसी जीवन में शरीर दुर्बल और क्षीण हो जाता है, बुढ़ापा जल्दी आता है, रोग अधिक होते हैं और कठिनाई से ठीक होने वाले स्त्रीरोग होने की आशंका बढ़ती है; यहाँ तक कि संतान उत्पन्न करने की क्षमता भी समाप्त हो सकती है। अधिक यौन दुराचार करने से परिवार टूटते हैं और उनमें कलह बढ़ती है, पत्नी और संतान बिछुड़ जाते हैं, अनेक पुराने द्वेष जमा होते हैं, काम में विफलता मिलती है, प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल जाती है, सौभाग्य और धन घटते हैं तथा आयु कम होती है। किशोर अश्लील सामग्री देखकर हस्तमैथुन और यौन दुराचार करते हैं, अपने सुंदर यौवन को क्षति पहुँचाते हैं तथा सदाचार और शरीर नष्ट करते हैं। किशोर ही देश का भविष्य हैं; क्या यह पीड़ा और खेद की बात नहीं? यह सचमुच देश और मनुष्यों को हानि पहुँचाने वाला छिपा हुआ हथियार है! अदृश्य ढंग से मनुष्य को नष्ट करता है, अदृश्य ढंग से उसे हानि पहुँचाता है!70
प्रश्न: आपकी बात सही है, लेकिन तर्क और समझदारी की बातें करके भी लोगों के मन को समझाया और दिशा दी जा सकती है। फिर नरक के इतने दंड और रक्तरंजित दृश्य लिखकर लोगों के मन में भय, घुटन, डर और बेचैनी पैदा करना आवश्यक क्यों है? इसके अलावा, अधिकांश लोग नरक के अस्तित्व पर विश्वास ही नहीं करते। क्या यह अपने रास्ते में स्वयं बाधा खड़ी करना नहीं है?
उत्तर: रोग के अनुकूल हो, तभी औषधि अच्छी होती है। आज संसार के बहुत-से लोग कर्मफल पर विश्वास नहीं करते; अतीत, वर्तमान और भविष्य के जन्मों के कर्मफल के विषय में तो और भी कहते हैं कि उसे देख पाना कठिन है। यह विशेष अधिकार वाला उपाय-द्वार इसलिए खोला गया है कि लोग देख सकें कि बुरे कर्मों का बुरा फल अवश्य मिलता है, ताकि संसार में रहते हुए वे पिछली गलतियाँ सुधारें, आने वाले जीवन को सँवारें और दुर्गति में गिरने से बचें। इसके अतिरिक्त, पुस्तक में कर्मफल के नियमों पर अनेक उपदेश भी हैं। इसमें सिद्धांत और घटनाओं, दोनों को समान महत्त्व दिया गया है; वे एक-दूसरे के पूरक हैं और एक-दूसरे को स्पष्ट करते हैं। इससे लोग परिणामों का भय जानकर रुकते हैं और रुकना जानकर सुधरते हैं। तब नरक का द्वार टूट जाता है और बोधि का मार्ग खुल जाता है।
प्रश्न: क्या 《परलोक के अटल विधान》 में लिखा सच है? मानो तो है, न मानो तो नहीं है। मैं इसे न पढ़ूँ, तो और अधिक निश्चिंत रहूँगा।
उत्तर: मानो तो है, न मानो तो नहीं है। सभी के लिए एक ही बात है। 《परलोक के अटल विधान》 में कही गई बातें सच हैं या नहीं, इसका मानदंड बुद्ध द्वारा उपदिष्ट कर्मफल के नियम होने चाहिए। यह पुस्तक नरक में बुरे कर्मों के प्रतिफल के एक छोटे-से अंश का आज विस्तार से वर्णन करती है, ताकि लोगों को भलाई की ओर ले जाए। इसका आधार यह नहीं होना चाहिए कि हमने स्वयं उसे देखा है या नहीं। जैसे बाह्य अंतरिक्ष के खगोलीय पिंड, अतीत में हमारे विज्ञान की सीमाओं के कारण खोजे न जा सके हों, तो इससे उनका अस्तित्व मिट नहीं जाता। क्या अभी दिखाई न देने का अर्थ न होना है? इसलिए सटीक रूप से कहा जाए, तो हो सकता है कि मनुष्य ने अभी उसे न देखा हो, लेकिन वह यह नहीं कह सकता कि वह निश्चित रूप से है ही नहीं।
हर परिस्थिति में मनुष्य के रूप में अपने कर्तव्य का पालन किया जाए, तो शरीर और मन शांत तथा संतुलित रहते हैं, परिवार सुखी और सौहार्दपूर्ण होता है और समाज में सद्भाव रहता है। देश का आधार लोग हैं और लोगों की जड़ सदाचार है। सच यही है कि सदाचार के बिना देश उन्नति नहीं कर सकता और सदाचार के बिना मनुष्य अपनी नींव स्थापित नहीं कर सकता!
दाओलान, आदरपूर्वक हाथ जोड़कर
परलोक के अटल विधान — खंड दो
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