सेनापति यूए फ़ेई: “औपचारिक प्रणाम रहने दीजिए! शांगगुआन युहुआ, आपको संकोच करने की आवश्यकता नहीं है। उठिए! जो कहना चाहती हैं, निःसंकोच सीधे कहिए।”
सेनापति यूए फ़ेई का रंग कुछ साँवला है और चेहरा बहुत गंभीर है, लेकिन वे परलोक के अनेक यमराजों जितने उग्र नहीं दिखते। उनमें एक प्रकार की गंभीरता और भरपूर न्यायभाव महसूस होता है। सेनापति ने परलोक के अधिकारी की धूसर रंग की पोशाक पहन रखी है।
सेनापति यूए फ़ेई: “शांगगुआन युहुआ, आपको यह 《परलोक के अटल विधान》 अच्छी तरह लिखनी चाहिए, ताकि मानव संसार के प्राणी जान सकें कि नरक में ले जाने वाले दुष्कर्म करने पर निश्चित ही वहाँ गिरकर असीम और अपार पीड़ा का कर्मफल भोगना पड़ता है। वहाँ गिरना आसान है, लेकिन बाहर निकलना बहुत, बहुत कठिन है। क्या आप मुझसे कुछ प्रश्न पूछना चाहती हैं?”
आ यू: “जी हाँ, सेनापति! मानव संसार में आपके बारे में बहुत-सी कथाएँ बची हुई हैं। उदाहरण के लिए, आपकी मृत्यु के लिए कौन ज़िम्मेदार था? अंततः छिन हुई ने आपकी जान ली थी या सम्राट ने? और अब आप उन दिनों अपने मारे जाने की घटना को किस दृष्टि से देखते हैं, उसके बारे में क्या सोचते हैं? जन-जन में लोकप्रिय और युगों से गाया जाता रहा 《मान जियांग होंग》 गीत क्या वास्तव में आपकी रचना है? यह भी कहा जाता है कि आप तीन राज्यों के काल के झांग फ़ेई के पुनर्जन्म थे। क्या ऐसा हुआ था? मैं आपसे ये प्रश्न पूछना चाहती हूँ। और अब आप परलोक में सेनापति हैं, तो छिन हुई कहाँ है? कृपया मुझ सामान्य स्त्री की शंकाएँ दूर करने का कष्ट करें।”
सेनापति यूए फ़ेई: “जीवित रहते वास्तव में छिन हुई ने ही मेरी जान ली थी। उस समय छिन हुई लगातार मुझसे ईर्ष्या करता था। आरंभ में उसे मुझसे केवल ईर्ष्या थी। वह इस बात से ईर्ष्या करता था कि सम्राट मेरी देशभक्ति की सराहना करते थे। इसलिए वह अक्सर सम्राट के सामने कुछ ऐसी बातें कहता या ऐसे काम करता था जिनसे मेरी युद्ध-योजनाओं में बाधा आए। उसने युद्ध आरंभ होने से ठीक पहले भी कई बार मेरी युद्ध-योजनाओं के विरोध में सुझाव दिए, लेकिन बार-बार प्रयास करने पर भी सफल नहीं हुआ।
उस समय मैंने नहीं सोचा था कि वह मेरी हत्या का विचार करेगा। मैं बस यही सोचता था कि छिन हुई के मन में ईर्ष्या है और काम करने का उसका ढंग मुझसे कुछ अलग है। काम के दौरान निजी विचारों में अंतर के कारण लोगों में टकराव हो ही जाता है। मुझे लगता था कि वास्तव में वह भी बस कुछ ऐसा कर दिखाना चाहता था जिससे सम्राट उसे विशेष सम्मान की दृष्टि से देखें।
अब देखने पर लगता है कि उस समय छिन हुई के बारे में मेरा आकलन सचमुच गलत था। मैं हमेशा यही समझता रहा कि उसके काम करने का ढंग मुझसे बस थोड़ा अलग है। परिणाम यह हुआ कि मैंने छिन हुई से सावधान रहने पर कोई खास ध्यान नहीं दिया। मैं पूरे मन से केवल सच्ची निष्ठा के साथ देश की सेवा करने की सोचता रहा।
मैं सोचता था कि लोगों के काम करने के ढंग अलग होते हैं; यदि वे एक-दूसरे को थोड़ा सहन करें और एक-दूसरे के अनुसार थोड़ा ढल जाएँ, तो बात बीत जाती है। मेरा ध्यान व्यापक स्थिति पर अधिक रहता था—घर और देश की रक्षा कैसे की जाए? व्यक्तिगत रंजिशों और संघर्षों को मन में रखना बिल्कुल सार्थक नहीं था, न ही छोटी-छोटी बातों पर उससे उलझना ज़रूरी था। मेरा हृदय पूरी तरह सच्चा और निष्ठावान था; मुझे किसी बात की सफ़ाई देने की आवश्यकता नहीं थी। पुरुष को अपने वास्तविक कर्मों से अपनी निष्कलंकता सिद्ध करनी चाहिए।
जहाँ तक उस समय मेरे मारे जाने की बात है, मेरे मन में कोई द्वेष नहीं है! विजय और पराजय सैनिक जीवन की सामान्य बातें हैं। आज मैं जीतता हूँ, तो कल हारने पर मुझे मृत्यु का सामना करना ही पड़ेगा। यह कभी भी हो सकता है। वह क्षण कब आता है, यह महत्वपूर्ण नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि मेरा बलिदान सार्थक हो और मेरी मृत्यु देश को लज्जित न करे। उस वर्ष मुझे झूठे आरोप लगाकर मार दिया गया था, फिर भी मैंने मन से आदेश मानकर मृत्यु स्वीकार की थी। मृत्यु से मुझे बिल्कुल भय नहीं था।
मृत्यु से पहले भी मेरे मन में माँ की वह सीख बनी हुई थी कि पूर्ण निष्ठा से देश की सेवा करनी चाहिए। इस बात का विचार आते ही कितनी आहें उठती थीं! मैं सोचता था कि पुत्र होकर भी मैं अभी माँ के पालन-पोषण का ऋण नहीं चुका पाया, न ही पूर्ण निष्ठा से देश की सेवा करने का अपना दायित्व पूरा कर पाया। देश अब एक और ऐसे योद्धा को खोने वाला था जो सच्चे मन से घर और देश की रक्षा करता था। मेरा अंतिम विचार यह था कि यदि अगला जन्म हुआ, तो मैं पूर्ण निष्ठा से देश की सेवा का दायित्व और अच्छी तरह निभाऊँगा। इसके बाद सम्राट के आदेश से मुझे मृत्युदंड दे दिया गया! मुझे किसी से घृणा नहीं थी—न छिन हुई से, जिसने चुगली और षड्यंत्र के द्वारा मेरी जान ली, न सम्राट से, जिन्होंने विवेकहीन होकर एक निष्ठावान और सज्जन व्यक्ति को मृत्युदंड दिया। मेरे लिए ये बातें अब महत्वपूर्ण नहीं रह गई थीं।