मृत्यु के बाद जब मैं परलोक के न्याय-सभागृह पहुँचा, तो परलोक के अधिपति यमराज ने देखा कि मारे जाने पर भी मेरे मन में न द्वेष था, न बदला लेने की इच्छा, और अंतिम समय तक मेरे हृदय में घर और देश की रक्षा का भाव बना रहा। इसलिए उन्होंने मुझे परलोक का सेनापति नियुक्त किया। अब मैं परलोक में सैन्य मामलों का प्रमुख हूँ। मानव संसार में कोई युद्ध होने वाला हो, तो हम परलोक में तीन महीने पहले ही युद्ध संबंधी व्यवस्था कर देते हैं।
क्योंकि मानव संसार का हर युद्ध वास्तव में मनुष्यों द्वारा अतीत में जीवों की हत्या करके अर्जित किए गए कुछ सामूहिक और निश्चित कर्मों का परिणाम भी होता है। सामान्य परिस्थितियों में निश्चित कर्म बदले नहीं जा सकते। यदि उन्हें वास्तव में बदलना हो, तो उनके रूपांतरण के लिए अत्यंत प्रबल महान सत्कर्म चाहिए। आम तौर पर बुद्ध की शक्ति के साथ अत्यंत प्रबल महान सत्कर्मों की शक्ति जुड़ने पर ही निश्चित कर्म को बदलने का अवसर मिलता है। यह परिवर्तन भी केवल निश्चित कर्म की हानि पहुँचाने वाली शक्ति को न्यूनतम कर देता है। आज लोगों के मन सदाचारी नहीं हैं, इसलिए निश्चित कर्म को बदलना बहुत कठिन है। इसीलिए 《परलोक के अटल विधान》 का प्रकाशित होना बहुत अच्छा है; यह लोगों के मन को सदाचार की ओर प्रेरित कर सकती है।
मानव संसार में युद्ध होने पर परलोक की सेना को युद्ध के तरह-तरह के विवरणों की व्यवस्था पहले से करनी पड़ती है। उदाहरण के लिए, कौन जीतेगा और कौन हारेगा? कितने लोग घायल होंगे और कितने मरेंगे? हम इन सभी बातों को पिछले जन्मों के कर्मफल के अनुसार व्यवस्थित करते हैं। अर्थात मानव संसार में युद्ध आरंभ भी नहीं हुआ होता कि परलोक में उसके परिणाम पहले ही तय करके जारी कर दिए जाते हैं। मेरी ज़िम्मेदारी सेना की व्यवस्था करना और युद्ध होने पर तरह-तरह के कार्य सँभालना है।
परलोक का युद्ध मानव संसार के युद्ध से अलग होता है। मानव संसार में युद्ध होने पर मनुष्यों के शरीर रक्त-मांस के होते हैं; घायल होने पर वे जीवन भर के लिए विकलांग हो सकते हैं, यहाँ तक कि मर भी सकते हैं। परलोक का युद्ध आध्यात्मिक शक्ति और मनोबल का युद्ध होता है। वह बिल्कुल अलग है।
छिन हुई निष्ठावान और सज्जन लोगों को सताकर मारने, भ्रष्टाचार करने तथा अन्य अपराधों के कारण अभी ताइशान नरक में दंड भोग रहा है। ताइशान नरक की सज़ा पूरी होने के बाद उसे जीभ उखाड़ने वाले नरक, आँखों में तीर मारने वाले नरक और अन्य नरकों में भी दंड भोगना होगा। छिन हुई ने जीवित रहते बहुत गंभीर दुष्कर्म किए थे। वह नरक से निकलकर स्वतंत्र होगा—मेरा विचार है कि वह बहुत दूर के भविष्य की बात है।
फिर भी मैं चाहता हूँ कि वह जल्द ही नरक के दुख से मुक्त हो सके। आखिर जीवित रहते हम दोनों एक ही समय में एक ही सम्राट की सेवा करते थे और एक ही देश की भूमि पर रहते थे। बस हम दोनों के काम और पद अलग थे; मेरी दृष्टि में मूलतः कोई अंतर नहीं था। हर व्यक्ति अपना-अपना दायित्व ठीक से निभाए, देश और राज्य की रक्षा करे और जनता का जीवन स्थिर बनाए—बस यही पर्याप्त है। व्यक्तिगत जीवन-मरण और सुख-चैन का कोई महत्व नहीं है। खाने के लिए भी तीन समय का भोजन और सोने के लिए भी एक बिस्तर ही चाहिए। बहुत अधिक पाने के पीछे भागने की आवश्यकता नहीं है; व्यापक जनसमुदाय का हित कर सकें, इतना ही पर्याप्त है।
मनुष्य के मन के विचार कितने महत्वपूर्ण हैं! अब मैं और छिन हुई दोनों ही परलोक में हैं, लेकिन हमारी दशाओं में आकाश-पाताल का अंतर है। मैं प्रतिदिन अब भी तरह-तरह की सैन्य व्यवस्थाओं में व्यस्त रहता हूँ। मानव संसार में मेरे साथ रहे कुछ अधीनस्थ भी अपनी आयु पूरी होने के बाद अब परलोक में मेरे साथ काम कर रहे हैं। इसके विपरीत, छिन हुई भी परलोक में ही है, लेकिन उसे नरक के असीम, अपार और लंबे कल्पों तक चलने वाले पीड़ादायक दंड सहने पड़ रहे हैं।
मैं संसार के लोगों को समझाना चाहता हूँ: जो अधिकारी हैं, वे कभी रिश्वत लेकर कानून को न तोड़ें और सार्वजनिक अधिकार का उपयोग निजी लाभ के लिए न करें। यदि वे पूरी निष्ठा से अपना कर्तव्य न निभाएँ, देश को धोखा दें, जनता का धन हड़पें, सामान्य लोगों को तिनकों जैसा तुच्छ समझें और अपने देशवासियों के सुख के लिए काम न करें, तो जीवित रहते राजकीय कानून से बच भी जाएँ, मृत्यु के बाद परलोक के विधान की कठोरता से बचना कठिन होगा! यदि वे पूरी निष्ठा से देश की सेवा करें, जनता से अपने शिशु जैसा प्रेम करें, हर बात में जनता के कल्याण को पहले रखें, देश की शांति और स्थिरता का भारी दायित्व उठाएँ, अपने शासक को धोखा न दें, एकांत में भी छल न करें और सदाचरण को दृढ़ता से अपनाएँ, तो यह जीवन समाप्त होने पर उनकी निष्ठावान आत्मा अवश्य सीधे देवलोक में उठेगी और हज़ारों-लाखों वर्षों तक आनंद भोगेगी!
आपने 《मान जियांग होंग》 गीत के बारे में पूछा था। वह वास्तव में उसी समय अपने हृदय के भावों से प्रेरित होकर मेरी रची हुई कृति है।86 जहाँ तक इस कथा का संबंध है कि मैं तीन राज्यों के काल के झांग फ़ेई का पुनर्जन्म हूँ, वह केवल एक कथा है, सत्य नहीं। मुझमें भला झांग फ़ेई जैसा पराक्रम कहाँ!
मैं आपको बताता हूँ कि परलोक के विधान पूर्णतः निष्पक्ष और स्पष्ट हैं। उनमें तनिक भी भूल या चूक नहीं होती, जबकि मानव संसार में बहुत-से ऐसे अन्यायपूर्ण, मनगढ़ंत और गलत निर्णय वाले मामले हैं जिनकी सच्चाई अस्पष्ट रहती है। इसके अतिरिक्त, परलोक में मानव संसार जैसी भ्रष्टाचार-निरोधक संस्था नहीं है। परलोक के सभी अधिकारी सार्वजनिक कर्तव्य और कानून का पालन करते हैं; वहाँ कोई भी भ्रष्ट अधिकारी नहीं होता। परलोक आने पर सब समान होते हैं। मानव संसार के सभी अन्यायपूर्ण मामलों की सच्चाई परलोक के दुष्कर्म-दर्पण मंच के सामने एक-एक करके पूरी तरह प्रकट हो जाती है। परलोक के कठोर विधान केवल दुष्कर्म करने वालों को कसकर बाँध सकते हैं; महान सदाचारी लोगों को वे बंधन में नहीं डाल सकते।