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《阴律无情》

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मैंने परलोक के न्यायाधिकारी से पूछा: “क्या परलोक के सभी प्राणियों को पुनर्जन्म लेने से पहले मेंग पो का सूप पीना पड़ता है?”

परलोक के न्यायाधिकारी ने कहा: “मेंग पो का सूप केवल परलोक में मिलता है। देवलोक, पश्चिमी सुखावती लोक या किसी भी अन्य दिशा के बुद्ध-क्षेत्र की शुद्ध भूमि में मेंग पो के सूप जैसी कोई बात नहीं है। जिन सभी प्राणियों की आत्माएँ परलोक लौटती हैं, उन्हें पुनर्जन्म लेने से पहले मेंग पो का सूप पीना पड़ता है। इसका काम उन्हें पिछला जन्म भुलाना है, ताकि वे अपनी कर्मशक्ति के अनुसार नए परिजनों के साथ नया जीवन बिताएँ। यदि मनुष्य मेंग पो का सूप पीकर अतीत की सारी बातें पूरी तरह न भुलाए, तो उसका मूल जन्मजात स्वभाव बुद्धिमान होता है और उसमें तरह-तरह की गहन विश्लेषण-क्षमताएँ होती हैं। पुनर्जन्म लेने पर कर्मशक्ति की बाधा के कारण गर्भ में प्रवेश करते समय विस्मृति हो जाने के बावजूद, कुछ विशेष परिस्थितियों और कारण-प्रत्ययों के प्रभाव से उसे पिछले जीवन के कुछ अंश याद आ सकते हैं। देवी मेंग पो के परलोक में काम करने आने से पहले यहाँ मेंग पो का सूप नहीं था।

प्राचीन काल के मनुष्य स्वभाव से भले थे। आरंभ में मानव संसार में आने वाले मनुष्यों के पूर्वज रूपधातु के आभास्वर देवलोक के देव थे। वे अपनी अलौकिक शक्ति से उड़कर पृथ्वी पर घूमने आए थे। उस समय पृथ्वी के पर्वत सुंदर थे, जल निर्मल था और हवा स्वच्छ थी। आज की तरह हर जगह वायु प्रदूषण और औद्योगिक रासायनिक प्रदूषण नहीं था। और मनुष्य के मन-स्वभाव को सबसे अधिक बिगाड़ने वाला प्रदूषण विभिन्न माध्यमों से आने वाली गलत और बुरी सूचनाओं का है।

उस समय धरती पर कुछ पृथ्वी-सार उगता था,89 जो अत्यंत ताज़े और चारों ओर फल-सुगंध फैलाने वाले फलों के आकार का था। यह पृथ्वी-सार कुछ हद तक देवलोक के फलों जैसा भी था। देव इन फलों की ओर आकर्षित हो गए। उस समय पृथ्वी पर कोई मनुष्य नहीं था। देव पाँच शीलों का पालन करते थे और चोरी से विरत रहने का शील नहीं तोड़ते थे। चूँकि पृथ्वी-सार किसी व्यक्ति का नहीं था, बल्कि धरती का था, इसलिए देवों ने उसे चखना शुरू किया। उन्हें वह बहुत स्वादिष्ट लगा और सबने खूब खाया।

जब देवों ने पेट भरकर पृथ्वी-सार खा लिया, तो पाया कि पृथ्वी के स्थूल पदार्थ खाने के कारण उनकी जन्मजात आध्यात्मिक ज्योति मंद पड़ गई है। उनके शरीर भारी लगने लगे और वे इच्छानुसार उड़ने की अलौकिक क्षमता पूरी तरह खो बैठे। अंततः वे उड़कर आभास्वर देवलोक लौट नहीं सके। बाद में उनके पास पृथ्वी पर खेती करने और संतान उत्पन्न करने के अलावा कोई उपाय नहीं रहा। वे यहीं बसकर शांति से जीवन और काम करने लगे और मनुष्यों के पूर्वज बने।

पृथ्वी-सार धरती का था। धरती से उत्पन्न पदार्थ खाकर देवों ने धरती के साथ एक अटूट संबंध बाँध लिया। इसलिए अब उन्हें पाँव धरती पर रखकर चलना पड़ा और वे उड़ नहीं सके। यद्यपि देव इच्छानुसार उड़ने की अलौकिक शक्ति खोकर देवलोक नहीं लौट सके, फिर भी उनके पास अलौकिक शक्तियाँ थीं; उन्होंने केवल उड़ने की क्षमता खोई थी।

सभी देव पाँच शीलों और दस कुशल कर्मों का पालन करके देवलोक में पहुँचे थे। उस समय पृथ्वी पर रहने आए देवों ने शील-पालन का अपना संकल्प बनाए रखा। वे कर्मफल में विश्वास करते थे और भले तथा निष्कपट थे। सब आपस में मेल-जोल से रहते थे, चारों ओर शांति थी और दुष्कर्म या शील-उल्लंघन का कोई आचरण नहीं था। लेकिन यह स्थिति अधिक समय तक नहीं रही। देवों की संतानों का पृथ्वी पर रहने का समय जितना बढ़ा, उनकी आध्यात्मिक ज्योति भी धीरे-धीरे उतनी ही अधिक घटती गई। पृथ्वी पर प्रदूषण शुरू हुआ और उसके आरंभिक सुंदर पर्वतों, निर्मल जल और स्वच्छ हवा की दशा भी बिगड़ने लगी। फिर भी उस समय पृथ्वी के मनुष्य आज के हम लोगों से बहुत अच्छे थे। मनुष्यों की पीढ़ियाँ बढ़ती गईं, उनकी जन्मजात आध्यात्मिक ज्योति क्षीण होती गई और उनके पुण्यफल लगातार घटते गए। लोग शीलों का पालन छोड़कर धीरे-धीरे स्वार्थी होने लगे। छोटी विपत्तियाँ और छोटी बीमारियाँ भी एक के बाद एक आने लगीं और दुष्कर्मों के साथ-साथ नरक भी धीरे-धीरे प्रकट होने लगे।

प्राचीन समय में नरक बहुत छोटा था और उसमें गिरने वाले लोग भी बहुत कम थे। किसी को दंड मिलता भी था, तो केवल कुछ वर्षों का। कुछ लोग नरक में कुछ वर्ष दंड भुगतकर मनुष्यलोक में जन्म लेने के बाद अपनी गलतियाँ सुधार लेते थे और नया जीवन शुरू करते थे। बाद में नरक में गिरने वाले जीवित संसार के लोगों की संख्या बढ़ती गई और आज नरक पूरी तरह भर चुका है। अब नरक में गिरने वालों को सामान्यतः सौ वर्ष या उससे अधिक का दंड मिलता है; केवल कुछ वर्षों का दंड पाने वाला अब कोई नहीं है। यह लोगों के अनुचित आचरण और विचारों तथा कर्म और उसके फल की समझ के गंभीर अभाव का परिणाम है।”

परलोक के न्यायाधिकारी ने आगे कहा, “अभी बताया था कि आभास्वर देवलोक के देव पृथ्वी पर उतरे थे। पृथ्वी-सार खाने के कारण उन्होंने अपनी अलौकिक शक्ति खो दी और उड़कर देवलोक नहीं लौट सके। बुद्ध ने ‘शूरंगम सूत्र’ में उपदेश दिया है: ‘जैसे मनुष्य तरह-तरह के अनाज खाता है, तो उसके पाँव धरती नहीं छोड़ते।’90 इससे स्पष्ट है कि हममें से प्रत्येक को हर समय अपने रोज़मर्रा के आचरण और विचारों पर सावधानी से ध्यान देना चाहिए। एक भी विचार में सजगता चूकी, तो हम बाहरी मिथ्या परिस्थितियों के वश में आ जाते हैं। अलौकिक शक्तियों से स्वतंत्रतापूर्वक विचरण करने वाले आभास्वर देवलोक के देवों ने नवगठित पृथ्वी की सुंदरता देखी थी (रूप), इसलिए वे यहाँ घूमने के लिए उड़कर आए। उन्हें पृथ्वी-सार फलों जैसा ताज़ा और रसपूर्ण लगा, और उससे तरह-तरह की प्राकृतिक सुगंध भी निकल रही थी। वे उसकी सुगंध से आकर्षित हुए (गंध), फिर उसे खाने लगे (स्वाद) और ग्रहण करने लगे (स्पर्श)। उस समय देवों के मन में उसे खाने का विचार उठा। उस विचार का उठना ही एक ऐसा मिथ्या विचार था, जो मन की सुंदर प्रकृति में बाधा डालता है (मानसिक विषय)। यही मिथ्या विचार आगे अनेक प्रकार के बाहरी व्यवहारों और कर्मों का रूप लेता है।

यद्यपि देवों ने चोरी न करने के शील का उल्लंघन नहीं किया था, फिर भी धरती के साथ बने इस अटूट संबंध का ऋण चुकाने में कुछ समय लगना था। लेकिन ऋण चुकाने की इस अवधि में तरह-तरह की घटनाएँ लगातार घटती रहती हैं। यदि हर विचार में सम्यक् स्मृति बनाए न रखी जा सके, तो जीवन का स्तर लगातार गिरता जाएगा और अनेक प्रकार के दुःखद नरक-फल देने वाले दुष्कर्मों के बीज भी पड़ते जाएँगे।

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